Wednesday, August 17, 2011

दाम मजदूर से कम, काम मालिक की निगरानी



पत्रकारिता के प्रारम्भिक दौर में इसे अभिव्यक्ति के साथ-साथ जनजागरण का माध्यम माना जाता था। किन्तु वर्तमान परिवेश में बदल रही पत्रकारिता की दिशा और दशा दोनों ही चिन्ता का विषय बनते जा रहें हैं। पत्रकारिता जगत में हो रहे इस परिवर्तन में कौन सी प्रक्रिया उचित है? इसके बारे में हम यहां राष्ट्रदेवपत्रिका के संपादक श्री अजय मित्तल जी से उनके विचार जानने का प्रयास कर रहें हैं-

प्रश्न 1. आपका पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का क्या उद्देश्य रहा?

उत्तर- पत्रकारिता चुनौतिपूर्ण व्यवसाय है। जो सत्ता सारी व्यवस्थाओं की निगरानी करती है, उसकी भी निगरानी करने का दायित्व पत्रकार का है। इसीलिए समाज को कुछ वैचारिक बदल की ओर अग्रसर करने के लिए मैंने पत्रकारिता को चुना जिससे आम लोग समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए अपना योगदान दे सकें।

प्रश्न 2. वर्तमान समय में आप पत्रकारिता के क्षेत्र में क्या बदलाव देखते हैं?

उत्तर- आज पत्रकारिता अपने मार्ग से भटक रही है। पत्रकारिता के आधार पर प्राप्त शक्तियों का पत्रकार दुरूपयोग कर रहे हैं। पहले पत्रकार देश में हो रहे घपलों, घोटालों व भ्रष्टाचार को उजागर करते थे लेकिन अब वह इसका हिस्सा बन रहे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह शीर्ष पत्रकारों का नाम आया उससे पत्रकार की गरिमा पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सभी स्तरों के पत्रकार प्रेस को प्राप्त अधिकारों को अपने विशेषाधिकार समझने लगे हैं और इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। स्वयं की सहूलियत के लिए पत्रकार ऐसा करते हैं। उनमें अब समाज के दिशा निर्देशक के बजाए राजनेता के गुण आ रहे हैं।

प्रश्न 3. राष्ट्रीय महत्व के मुददों पर मीडिया की भूमिका और प्रभाव को आप किस प्रकार से देखते हैं?

उत्तर- सामान्य आदमी के पास न तो तथ्यों की जानकारी होती है और न ही विश्लेषण क्षमता। तथ्य और उनका विश्लेषण वह मीडिया से ही प्राप्त करता है। मीडिया ने आम आदमी की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर अपनी इच्छानुसार तथ्यों और विश्लेषणों को प्रस्तुत करना और उसके अनुसार समाज को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। मीडिया को अगर भ्रष्टाचार से कुछ प्राप्त होने की उम्मीद होती है तो वह तथ्यों में बदलाव कर देती है या उसे खत्म ही कर देती है। वहीं मीडिया को यदि कुछ निजी लाभ नहीं मिलता तो वह उन्हीं तथ्यों को खोजी पत्रकारिता का नाम दे देती है। ऐसे पत्रकार अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर समाज को अधूरे तथ्य, अर्द्ध-सत्य, असत्य बताकर पत्रकारिता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

प्रश्न 4. आपकी पत्रिका राष्ट्रदेव ग्रामीण क्षेत्रों में जाती है। ग्रामीण पाठकों के बारे में आपका क्या अनुभव रहा है?

उत्तर- ग्रामीण पाठक देश की समस्याओं के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। वह अपने स्थानीय परिवेश से बाहर जाकर राष्ट्र स्तर पर विचार करना चाहते हैं, देश के इतिहास, महापुरूषों को जानना चाहते हैं। वह पत्रिका के राष्ट्रीय विचारों का बड़ी संख्या में स्वागत करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के पाठकों के बीच किए गए सर्वे के दौरान पता चला कि वह देश के बारे में सोचने की ललक रखते हैं और इसीलिए वह राष्ट्रीय विचारों को पढ़ना भी पसंद करते हैं।

प्रश्न 5. आप अपनी पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास करते रहे हैं। क्या आज का मीडिया राष्ट्रवाद के प्रश्न पर अपनी भूमिका का निर्वाह सही ढंग से कर रहा है?

उत्तर- राष्ट्रीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले पत्रों का स्वर राष्ट्रहित के अनुकूल है। अंग्रेजी मीडिया भारतीय परिवेश व संस्कृति को नहीं समझती। वह देश की समस्याओं और यहां के परिवेश को पश्चिमी चश्मे से निहारती है और विश्लेषण प्रस्तुत करती है। अक्सर यह देखा गया है कि जो अखबार राष्ट्रवाद के समर्थक थे उनकी प्रसार संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है और जिन्होंने पंथ-निरपेक्षता के नाम पर राष्ट्रवाद को गिराने का कार्य किया वह ज्यादा नहीं चल पाए।

प्रश्न 6. वर्तमान समय में व्यवस्था परिवर्तन को लेकर चल रहे आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में जनजागरण के विषय पर मीडिया की भूमिका कितनी उपयोगी साबित हुई है?

उत्तर- चाहे अन्ना का आंदोलन हो या बाबा रामदेव का, सौभाग्य से मीडिया ने अच्छा प्रदर्शन किया। मीडिया ने अच्छे पक्षों को लगभग ठीक प्रकार से प्रस्तुत किया। इसीलिए राजनेताओं ने इन आंदोलनों को बदनाम करने के लिए कार्रवाई की। मीडिया इस समय व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दे पर लगभग समान और अनुकूल विचार रख रहा है।

प्रश्न 7. आप उत्तर प्रदेश पत्रकार एसोसिएशन मेरठ के अध्यक्ष हैं। पत्रकारों की कौन सी प्रमुख समस्याएं हैं, जिनको लेकर पत्रकार को लड़ाई लड़ने की आवश्यकता पड़ती है?

उत्तर- पत्रकारों, विशेषकर जो छोटे और मंझले पत्रों में काम कर रहे हैं, के सामने सबसे बड़ी समस्या वेतन की है। छोटे अखबारों में तो वेतन सरकार द्वारा अकुशल कर्मियों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम है। छोटे अखबारों में पत्रकारों को मिट्टी ढोनेवाले मजदूरों को मिलने वाले वेतन से भी आधा वेतन मिलता है। जबकि पत्रकारों की बड़ी संख्या इन्हीं छोटे एवं मझले समाचार पत्रों व चैनलों में कार्यरत हैं। वहीं पत्रकारों के लिए काम के घंटे भी बहुत अधिक है जिसके कारण वह न तो अपना श्रेष्ठतम योगदान दे सकते हैं और न ही उन्हें अध्ययन के लिए समय मिल पाता है। यह स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। इसके अलावा पत्रकारों के बेहतर भविष्य के लिए बीमा जैसी योजनाएं भी होनी चाहिए। आज यह आवश्यक है कि पत्रकार आर्थिक रूप से इस लायक तो हो कि वह वर्तमान और भविष्य की चिंता से मुक्त रह सकें।

प्रश्न 8. जेडे हत्याकांड से एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा का मुददा सामने आया है। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए आपके अनुसार क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

उत्तर- पत्रकारों के लिए सुरक्षा नीति बनाए जाने की आवश्यकता है। यह संभव नहीं है कि हरेक पत्रकार के साथ एक अंगरक्षक चल सके लेकिन इसके लिए बेहतर कानून होना चाहिए। राज्य स्तर पर कर्मचारियों के काम में बाधा डालने वाले पर कार्रवाई का कानून बना हुआ है, लेकिन पत्रकार को उसके काम के लिए धमकी अथवा रूकावट को इस कानून के दायरे में नहीं लिया जाता। पत्रकारों के विरूद्ध आपराधिक मामले की जांच भी जिले के एसपी स्तर के अधिकारी की देखरेख में होनी चाहिए क्योंकि छोटे स्तर के पुलिस अधिकारियों तक अपराधियों की पहुंच होती है। यह जिला स्तर का पुलिस अधिकारी पत्रकार-संबंधी किसी भी मामले की जांच की जानकारी राज्य शासन को भी नियमित भेजे।

प्रश्न 9. वर्तमान समय में किस पत्रकार की पत्रकारिता आपको आदर्श पत्रकारिता के सबसे निकट दिखाई देती है?

उत्तर- पत्रकारिता क्षेत्र सेवा क्षेत्र है। पांचजन्यसमाचार पत्र आज कम वेतन में भी समाज को सर्वोत्कृष्ट दे रहा है। आजादी से पहले बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे पत्रकारों की पत्रकारिता बड़ी आदर्श थी। उन्होंने अपने समाचार पत्र आजऔर रणभेरीमें अंग्रजों के खिलाफ जमकर लिखा और किसी भी प्रकार के प्रलोभन में नहीं आए। मेरे विचार में वर्तमान समय में ऐसी ही पत्रकारिता की आवश्यकता है जैसी पराड़कर जी के द्वारा की गई थी। वैसे तो हिन्दी पत्रकारिता की नींव ही त्याग, बलिदान और संघर्ष पर रखी गई थी। आदि संपादक जुगल किशोर शुक्ल ने अपने उदंत मार्तण्डनामक हिंदी के प्रथम पत्र को सरकारी प्रलोभनों से दूर रखकर आर्थिक कठिनाइयों से ही चलाया। आज के पत्रकार को इन उदाहरणों को भूलना नहीं चाहिए।

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Thursday, July 28, 2011

अंकों के दबाव में मौत से लगाव


भारत की मौजूदा शिक्षा नीति और सामाजिक परिवेश के चलते युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जिनमें आत्मविश्वास की कमी सामने आ रही है। हाल ही में 10वीं एवं 12वीं के छात्रों द्वारा आत्महत्या के कई मामले सामने आए हैं जिनमें ऐसे छात्र-छात्राएं भी शामिल हैं जो अच्छे प्रतिशत से उत्तीर्ण हुए हैं लेकिन आत्महत्या करने वाले यह सभी छात्र अवसादग्रस्त रहे होंगे। किसी ने अभिभावकों की उम्मीदों पर खरा न उतरने के कारण तो किसी ने पसंदीदा कॉलेज में प्रवेश न मिलने के कारण आत्महत्या का कदम उठाया। आज के प्रतिस्पर्धा भरे युग में अपनी जगह बनाने का डर युवाओं को सता रहा है जिसमें हमारी शिक्षा नीति भी जिम्मेदार है।
बेंगलुरू में रहने वाली एक छात्रा ने 85 प्रतिशत अंक आने के बावजूद आत्महत्या की जिसके पीछे कारण था कि वह 90 प्रतिशत अंक चाहती थी और कम अंक आने के कारण उसे अपने पसंदीदा कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला था। वहीं राजकोट के एक छात्र ने 10वीं परीक्षा के नतीजे आने से पहले मौत को गले लगा लिया। वह शहर के टॉपर में से एक था लेकिन उसे इस बात का डर सता रहा था कि इस बार उसके अच्छे अंक नहीं आएंगे। जबकि रिजल्ट आया तो पता चला कि 90 प्रतिशत अंकों के साथ वह टॉपर है। इसी प्रकार अन्य छात्रों ने भी परीक्षा में असफल होने या कम अंक आने की वजह से मौत को गले लगा लिया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा वर्ष 2009 में जारी आंकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन औसतन 6 छात्र परीक्षाओं में असफल होने के कारण आत्महत्या करते हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2007 में 1976, वर्ष 2008 में 2189 छात्रों ने परीक्षाओं में असफल होने के कारण आत्महत्या की वहीं वर्ष 2009 में कुल 2010 छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें से 15-29 वर्ष की आयु वाले छात्रों का आंकड़ा सबसे ज्यादा 1591 है। इससे स्पष्ट होता है कि युवाओं में परीक्षाओं को लेकर ज्यादा तनाव है जिनमें से कुछ इस तनाव के समाधान के रूप में आत्महत्या का विकल्प चुनते हैं। अपने भविष्य को लेकर भी युवा तनावग्रस्त रहते हैं। वर्ष 2007 में अपना कैरियर बनाने में नाकाम 1273 व्यक्तियों ने आत्महत्या की। वहीं वर्ष 2009 में इसका आंकड़ा बढ़कर 1354 हो गया।
आखिर क्यों छात्रों के आत्महत्या करने का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है? इसके पीछे शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक परिवेश ही जिम्मेदार नजर आते हैं। देश में विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्रों की अपेक्षा होती है कि वह कॉलेज में स्नातक की शिक्षा प्राप्त करें लेकिन सीटें कम होने के कारण और आवेदन ज्यादा होने के कारण इन कॉलेजों की कट-ऑफ भी ज्यादा होती है। इसके कारण अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद भी छात्रों को प्रवेश नहीं मिल पाता है और उन्हें निराशा हाथ लगती है। पिछले कुछ वर्षों में निस्संदेह विद्यालयों की संख्या बढ़ी है और शिक्षा के प्रति जागरूकता भी आई है, लेकिन विद्यालयों की अपेक्षा विश्वविद्यालयों की संख्या में अभी भी कमी है। राज्य स्तर पर विश्वविद्यालयों की कमी के कारण छात्र उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। इन विश्वविद्यालयों में सीटें सीमित होने और आवेदन सीटों की अपेक्षा कहीं अधिक होने के कारण कई छात्रों को प्रवेश नहीं मिल पाता है। परिणामस्वरूप वह तनाव का शिकार हो जाते हैं। विश्वविद्यालयों में सीटें कम होने के कारण 10वीं और 12वीं कक्षा में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है।
दूसरी ओर प्रतिस्पर्धा के माहौल में अभिभावकों का भी अच्छे नंबर लाने के लिए दबाव बना रहता है। परीक्षा में अच्छे नंबर न आने के कारण अभिभावक तुलना शुरू कर देते है जिसके कारण छात्र हीन-भावना का शिकार हो जाते हैं। इन्हीं सब कारणों के चलते छात्र आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। देश के भविष्य का निर्माण करने वाली शिक्षा नीति में व्यापक स्तर पर सुधार की जरूरत है। आज सीबीएसई बोर्ड को देशभर में मान्यता दी हुई है जिसके कारण अन्य बोर्ड पिछड़ रहे हैं। आज राज्य स्तर पर शिक्षा बोर्डों में सुधार की ओर कदम बढ़ाए जाने की आवश्यकता है जिससे वह भी सीबीएसई के समकक्ष शिक्षा व्यवस्था स्थापित कर सकें और पाठ्यक्रम में सुधार कर सकें। दूसरी ओर व्यापक स्तर पर विश्वविद्यालय भी खोले जाने चाहिए जिससे छात्रों को अपने ही राज्यों में उच्च शिक्षा प्राप्त हो सके। वहीं अभिभावकों को भी छात्रों पर अधिक दबाव नहीं डालना चाहिए।
एक ओर तो सरकार सर्व शिक्षा अभियान के कारण अपना सीना गर्व से ऊंचा करके खड़ी है वहीं दूसरी ओर छात्र इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। इसके लिए अवश्य ही कुछ सुधार किए जाने चाहिए अपितु तनावग्रस्त युवाओं के साथ देश के भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है।

Thursday, June 2, 2011

आई वॉना फ्रेंडशिप विद यू!



हाय! मेरा नाम सुजैना है, मैं कॉलेज में पढ़ती हूं ! क्या आप मुझसे दोस्ती करना चाहते हैं! मैं आपकी सारी प्रॉबलम्स दूर कर दूंगी! मेरा नंबर 981…… है ।

कई बार आपके फोन पर इस तरह के फ्रेंडशिप प्रपोजल आए होंगे । यहां तक कि बॉलीवुड हस्तियों ने भी आपको अपना नंबर दिया होगा, कभी प्रियंका चोपड़ा तो कभी कंगना राणावत ! और फ्रेंडशिप करने के लिए जब आपने फोन मिलाया होगा तो स्वीट आवाज में किसी लड़की ने आपसे बात की होगी और यहां शुरू हुआ होगा “फेक फ्रेंडशिप” का सिलसिला !

टेलीकॉम कंपनियों ने प्रतिस्पर्धा की होड़ में इस तरह की सर्विस भी शुरू की है । ये कंपनियां लड़कियों को नौकरी पर रख उन्हें एक नंबर मुहैया कराती है और क्लांइंट्स से दोस्ती करने की ट्रेनिंग देती हैं । अपनी व्यस्त दिनचर्या से तनावग्रस्त लोग जब इन्हें फोन मिलाते है तो उन्हें एक नया दोस्त मिलता है । लेकिन अनजाने में वह अपना ही नुकसान करते हैं क्योंकि इन नंबरों की कॉल दर सामान्य से अधिक होती है । फोन पर दोस्ती करने का दावा करने वाली ये लड़कियां अधिकतर दूसरे राज्यों की होती हैं । अपना खर्चा पूरा करने की आड़ में वह यह काम करती हैं । टेलीफोन कंपनियां बकायदा इनका फोन ट्रेस करती हैं और सारी बाते रेकॉर्ड करती हैं । फोन पर ये दोस्त अपना नाम गलत बताने के साथ-साथ घर का पता, ऑफिस का पता व निजी जानकारी सब कुछ गलत बताते हैं । यदि कोई इनसे मिलने की इच्छा जताए तो यह कोई भी बहाना बनाकर टाल देते हैं ।

फेक फ्रेंडशिप क्लब का धंधा कर ठगी के मामले भी सामने आ रहे हैं । हाल ही में दिल्ली पुलिस ने इसी तरह के एक फ्रेंडशिप क्लब व मसाज पार्लर पर छापा मार 20 महिलाओं समेत 25 लोगों को गिरफ्तार किया है । इन लोगों ने जनकपुरी में अपना कॉल सेंटर जैसा ऑफिस खोल रखा था जहां लड़कियां पुरूषों को बात करने के लिए अपने एकाउंट में रूपये जमा कराने को कहती थीं । 1000 रूपये रजिस्ट्रेशन फीस के जमा कराने के बाद क्लाइंट से पूछा जाता था कि वह किस श्रेणी की महिला से बात करने का इच्छुक है । पहली श्रेणी में मॉडल शामिल थी जिनसे बात करने के लिए 7000 रूपये, दूसरी श्रेणी में कॉलेज की लड़कियों से बात करने के लिए 5000 रूपये और तीसरी श्रेणी में गृहणियों से बात करने के लिए 3000 रूपये जमा कराने होते थे । जिन महिलाओं को गिरफ्तार किया गया वह सभी 19-24 वर्ष की आयु की थी । इन्होंने ‘हनीमुन नाइट्स फ्रेंडशिप क्लब’ के नाम से अखबार में विज्ञापन भी दिया था । पुलिस ने इनके पास से 2 लैपटॉप, 60 मोबाइल फोन और कॉल विवरण वाले 52 रजिस्टर जब्त किए हैं ।

फेक फ्रेंडशिप के नाम पर लोगों को लूटने में पुरूष भी पीछे नहीं है । एक पूर्व रिलेशनशिप मैनेजर, जिसका नाम जाफर हुसैन था, को दिल्ली पुलिस ने राधिका नाम की लड़की की शिकायत पर गिरफ्तार किया । उसने राधिका को घर छोड़ने के बहाने से उसका लैपटॉप, दो मोबाइल फोन और पर्स में पड़े रूपये लूट लिये । जांच के दौरान पाया गया कि हुसैन के फोन में कई लड़कियों के नंबर थे और वह फोन और इंटरनेट के जरिए दोस्ती करता था । उनके साथ फिल्म देखने के बहाने से वह बैग में से कीमती समान निकाल उसमें पत्थर रख देता था जिससे वजन में अंतर का पता न चले ।

फेक फ्रेंडशिप के नाम पर लोगों को लूटने की कई वारदातें सामने आ रही है । फोन पर मीठी-मीठी बातें कर उन्हें लूटने का धंधा खूब फलफूल रहा है । दोस्त नाम का मतलब उस व्यक्ति से होता है जो हर मुसीबत में आपके काम आए लेकिन फोन पर बनाए गए दोस्त तो खुद आपको मुसीबत में डाल देते है और फरार हो जाते है । अगली बार जब आपके पास दोस्ती के लिए फोन आए तो दोस्ती करने से पहले एक बार सोचिएगा जरूर!

Sunday, May 15, 2011

भ्रष्टाचार में लिप्त हैं विश्वविद्यालयों के कुलपति



किसी भी देश के विकास का प्रमुख आधार शिक्षा है । शिक्षा के बिना देश का विकास संभव नहीं है । शिक्षा को सेवा क्षेत्र में शामिल किया गया है जिससे सभी की शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित हो सके । लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा का व्यावसायीकरण होता गया जिसके कारण यह भ्रष्टाचार के दलदल में भी धंसता चला गया । आज भारत में अधिकतम विश्वविद्यालय भ्रष्टाचार का अड्डा बन गए हैं और भ्रष्टाचार का यह खेल स्वयं कुलपति के ही नाक के नीचे खेला जा रहा है । विश्वविद्यालय के संचालन से लेकर शिक्षा की गुणवत्ता का कार्यभार कुलपति पर होता है । ऐसे में इस पद पर किसी उच्च शिक्षित, मूल्यों पर चलने वाले एवं ईमानदार व्यक्ति के सुशोभित होने की अपेक्षा की जाती है । लेकिन सबसे शर्मनांक बात तो यह है कि कुछ विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति भी अवैध रूप से हुई है और उनकी डिग्रियां भी फर्जी पाई गई है । कुलपति बनने के लिए उच्च शिक्षा का कोई मोल नहीं रह गया है । योग्यता, मर्यादा को ताक पर रखकर कुलपति चयन का अधार केवल पैसा, जाति, क्षेत्र एवं चापलूसी रह गया है ।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने देश के कुल 25 भ्रष्ट कुलपतियों की सूची जारी की है । इन कुलपतियों की नियुक्ति कहीं राजनीतिक दबाव के कारण हुई तो कहीं पैसों के लेनदेन के आधार पर । यही कुलपति आगे अयोग्य अध्यापकों की नियुक्ति कर देश का भविष्य खतरे में डाल रहे हैं । विद्यार्थी परिषद द्वारा जारी भ्रष्ट कुलपतियों की सूची निम्नलिखित है ।

1 मध्यप्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति कमलाकर सिंह पर पी.एच.डी. की नकल का आरोप है जिसके कारण इन पर धारा 420 के तहत केस दर्ज किया गया है । इन्होंने एल.एल.बी. की डिग्री फर्जी तरीके से नौकरी में रहते हुए भी रैगुलर कोर्स से प्राप्त की । सिंह पर विश्वविद्यालय में आर्थिक भ्रष्टाचार करने का भी आरोप है ।

2 मध्यप्रदेश के भोज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एस. के. सिंह पेपर लीकेज में दोषी पाए गए है । उन्होंने प्रिंटिंग में 35 लाख रूपये व पाठ्यसामग्री लिखवाने एवं विश्वविद्यालय के लिए जरूरी सामानों की खरीद में लाखों का घोटाला किया है । उन पर फर्जी नियुक्तियों का भी आरोप है एवं उन्होंने विधानसभा में भी गलत जानकारी प्रस्तुत की ।

3 कर्नाटक के विश्वेसरैया तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. महेशप्पा ने अपनी नियुक्ति के समय स्नातकोत्तर डिग्री के फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किये और रक्षा अनुसंधान एवं विकास परिषद (डीआरडीओ) के सामने गलत सूचना दी ।

4 कर्नाटक के महिला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. सैयद अखतर ने 92 प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों की नियुक्तियों में भ्रष्टाचार किया और विश्वविद्यालय के कोष का स्वयं के लाभ के लिए दुरूपयोग किया ।

5 कर्नाटक के मैसूर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. शशिधर प्रसाद ने 162 प्राध्यापकों एवं 151 कर्मचारियों की नियुक्ति में यूजीसी एवं वि.वि. नियमों का खुला उल्लंघन किया । नियुक्ति प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना तथा अनु. जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की आरक्षण नीति की अवहेलना की । इन्होंने डा. रंगविथालाचार कमेटी के द्वारा लगाए गए आरोपों पर भी कोई कार्रवाई नहीं की ।

6 बैंगलोर के आर.जी.यू.एच.एस. विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. पी.एस. प्रभाकरन की मेडिकल के पी.जी. के लिए कॉमन एंटरेंस टेस्ट में गैरकानूनी रूप से संलिप्तता पाई गई है । सीबीआई ने प्रभाकरन पर आईपीसी की धारा 420 के तहत केस दर्ज किया है ।

7 आन्ध्र प्रदेश स्थित पालमूर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री गोपाल रेड्डी पर आर्थिक भ्रष्टाचार, अपने चहेतों को अनाधिकृत लाभ देना, विश्वविद्यालय के एकाउन्ट में किसी भी तरह की पारदर्शिता का न होना और 12 करोड़ रूपये के घोटाले का आरोप है ।

8 आन्ध्र प्रदेश के श्रीकृष्ण देव राय विश्वविद्यालय की कुलपति श्रीमति कुसुम कुमारी पर नियुक्ति में भ्रष्टाचार, अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति, आरक्षण नीति का पालन न करने का आरोप है । कुसुम पर राज्य सरकार की जांच कमेटी में आरोप सिद्ध हुए हैं ।

9 गुजरात में सूरत स्थित वीर नरमद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बी.ए. प्रजापति ने प्रश्न पत्र लीक करने वाले कॉलेजों का सहयोग किया, टेण्डर देने में भारी भ्रष्टाचार किया व अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति की । इस विश्वविद्यालय की कुल 370 फर्जी मार्कशीट पकड़ी गई है ।

10 अहमदाबाद स्थित गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति डा. परिमल त्रिवेदी ने महाविद्यालयों पर दबाव बनाया कि वह अयोग्य छात्रों से पैसा लेकर उन्हें प्रवेश दे । उन्होंने अपनी पत्नी को उनकी परीक्षा में अनुचित लाभ दिलाया और उत्तर पुस्तिका प्रिन्टिंग में भ्रष्टाचार किया ।

11 छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एम.पी. पाण्डेय पर भारी वित्तीय अनियमितताओं और नियुक्तियों में धांधली करने का आरोप है ।

12 असम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. तपोधीर भट्टाचार्जी पर पैसे लेकर अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति करने, विश्वविद्यालय की नेटवर्किंग में दो करोड़ रूपये का घोटाला करने, फंड का गलत प्रयोग और विश्वविद्यालय में परिवारवाद को बढ़ावा देने के आरोप है ।

13 असम के डिब्रुगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति कन्दर्प कुमार डेका की नियुक्ति ही अवैधानिक है । डेका ने परीक्षा परिणाम में भारी धांधली की है ।

14 बिहार स्थित मगध विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अरविन्द कुमार पर भ्रष्टाचार व अवैध नियुक्ति का आरोप है । 4 मई 2011 को पटना उच्च न्यायालय ने नियुक्ति को ही अवैध घोषित किया ।

15 बिहार स्थित तिलकामांझी विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डा. प्रेमा झा पर अवैध नियुक्ति, निर्माण कार्य में अनियमितता, उप कुलसचिव की अवैध नियुक्ति का आरोप है । उन पर धारा 420, 409, 465, 467, 468, 166, 177, 553, 120बी, 324 के तहत मामला दर्ज किया गया है ।

16 बिहार के छपरा जिले में स्थित जयप्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति डा. दिनेश प्रसाद सिन्हा पर शराब पीकर लोक गीत गायिका देवी के साथ छेड़छाड़ का आरोप है । दिनेश पर धारा 341, 342, 323, 354, 509 के तहत केस दर्ज है ।

17 जयप्रकाश विश्वविद्यालय के ही पूर्व कुलपति डा. आर. पी. शर्मा पर छल से धन गबन करने के आरोप में धारा 409 व 420 के तहत मामला दर्ज किया गया है ।

18 झारखण्ड के कोल्हान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. फादर बैनी एक्का पर 21.5 लाख का अग्रिम राशि गबन का अरोप है ।

19 उत्तर प्रदेश स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति डा. मनोज मिश्रा पर बीएड प्रवेश परीक्षा में 11 करोड़ के घोटोले, नियुक्तियों में धांधली, मूल्यांकन में भारी अनियमितताओं व महाविद्यालयों को फर्जी मान्यता देने का आरोप है ।

20 उत्तर प्रदेश के वी.वी.डी. विश्वविद्यालय के कुलपति डा. ए.के. मित्तल पर उत्तर पुस्तिका प्रिंटिंग में 5 करोड़ व सत्र 2008-09 में नामांकन एवं परीक्षा शुल्क में 1.25 करोड़ के घोटालों का आरोप है ।

21 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पी.के. अब्दुल अजीज पर वित्तीय अनियमितताओं के चलते सीबीआई की जांच चल रही है । अजीज ने पूर्व छात्र परिषद के नाम पर अरब देशों से करोड़ों रूपयों की उगाही की है ।

22 गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अरूण कुमार पर बीएड में धांधली का आरोप सिद्ध हुआ जिसके बाद उन्हें राज्यपाल ने बर्खास्त कर दिया ।

23 उत्तर प्रदेश स्थित पूर्वाचल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एन.सी. गौतम पर भी बीएड में धांधली और नियुक्तियों में अनियमितताओं का आरोप है ।

24 उत्तराखण्ड स्थित कुमायुं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सी.पी. बरतवाल पर कई छात्रों को फर्जी पी.एच.डी. करवाने, अपने रिसर्च पेपर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर तैयार करने और आर्थिक आरोप है ।

25 राजस्थान के जयनारायण विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. नवीव महतो पर नियुक्तियों में भ्रष्टाचार करने, विश्वविद्यालय के गोपनीय विभाग की गोपनीयता को स्वयं भंग करने और निजी एजेन्सी द्वारा परीक्षा परिणाम बनाने में भारी गड़बड़ी करने का आरोप है ।

इस प्रकार के अयोग्य एवं भ्रष्ट कुलपतियों के कारण विश्वविद्यालयों का वातावरण खराब हो रहा है । प्रवेश परीक्षाओं एवं परिणामों में भारी अनियमितताएं हो रही है जिससे होनहार छात्रों का भी मनोबल घटता है । शिक्षा संस्थानों में अध्यापकों का चयन योग्यता को ताक पर रखकर पैसों व परिवारवाद के आधार पर होगा, तो देश के भविष्य का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । अतः शिक्षा संस्थानों में नियुक्ति व परिणामों में पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत है जिससे शिक्षा की फर्जी दुकानों से निजात मिल सके ।

Wednesday, April 27, 2011

अक्षय ऊर्जा से जगमगाएगा भारत!

गांव में ऊर्जा की आपूर्ति नहीं है जिसके कारण लोग रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करते हैं । शहरों में बिजली की आपूर्ति के कारण वहां उद्योग विकसित हो रहे है जिसके कारण गांव की अपेक्षा शहरों में भीड़ बढ़ती जा रही है । ऊर्जा आपूर्ति के लिए गैर नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे कोयला, कच्चा तेल आदि पर निर्भरता इतनी बढ़ रही है कि इन स्रोतों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है । विशेषज्ञों का कहना है कि अगले 40 वर्षों में इन स्रोतों के खत्म होने की संभावना है । ऐसे में विश्वभर के सामने ऊर्जा आपूर्ति के लिए अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बिजली प्राप्त करने का विकल्प रह जाएगा । अक्षय ऊर्जा नवीकरणीय होने के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल भी है । हालांकि यह भी सत्य है कि देश की 80 प्रतिशत विद्युत आपूर्ति गैर नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरी हो रही है । जिसके लिए भारी मात्रा में कोयले का आयात किया जाता है । वर्तमान में देश की विद्युत आपूर्ति में 64 प्रतिशत योगदान कोयले से बनाई जाने वाली ऊर्जा तापीय ऊर्जा का है । ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति और अन्य कार्यों के लिए कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का भी आयात किया जाता है जिसके कारण भारत की मुद्रा विदेशी हाथों में जाती है । आंकड़ों पर गौर किया जाए तो वर्ष 2009-10, 2008-09 में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का कुल सकल आयात क्रमशः 4,18,475 करोड़, 4,22,105 करोड़ था जबकि इसकी तुलना में निर्यात क्रमशः 1,44,037 करोड़, 1,21,086 करोड़ था । अतः आयात और निर्यात के बीच इतना बड़ा अंतर अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला है जिसे कम किए जाने की जरूरत है । यह अक्षय ऊर्जा के प्रयोग से ही संभव है । भारत में अक्षय ऊर्जा के कई स्रोत उपलब्ध है । सुदृढ़ नीतियों द्वारा इन स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है ।

सौर ऊर्जा

सूरज से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए फोटोवोल्टेइक सेल प्रणाली का प्रयोग किया जाता है । फोटोवोल्टेइक सेल सूरज से प्राप्त होने वाली किरणों को ऊर्जा में तब्दील कर देता है । भारत में सौर ऊर्जा की काफी संभावनाएं हैं क्योंकि देश के अधिकतर हिस्सों में साल में 250-300 दिन सूरज अपनी किरणें बिखेरता है । फोटोवोल्टेइक सेल के जरिए सूरज की किरणों से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है । भारत में पिछले 25-30 वर्षों से सौर ऊर्जा पर काम हो रहा है लेकिन पिछले तीन सालों के दौरान इसमें गति आई है । सरकार ने वर्ष 2009 में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन का अनुमोदन किया जिसका उद्देश्य वर्ष 2022 तक ग्रिड विद्युत शुल्क दरों के साथ समानता लाने के लिए देश में सौर ऊर्जा प्रौद्योगिकियों का विकास और संस्थापन करना है । सरकार की इस भागीदारी से लोग सौर ऊर्जा को समझने लगे हैं । हालांकि सौर ऊर्जा का विकास बहुत धीमी गति से हो रहा है । ग्याहरवी पंचवर्षीय योजना के दौरान सौर ऊर्जा से 50 मेगावॉट बिजली प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन सितम्बर 2010 तक केवल 8 मेगावॉट बिजली ही उत्पादित की जा सकी । सौर ऊर्जा में प्रतिवर्ष लगभग 5 हजार खरब यूनिट बिजली बनाने की संभावना मौजूद है जिसके लिए इस दिशा में तीव्र गति से कार्य किए जाने की आवश्यकता है ।

देश के टेलीकॉम टॉवर प्रतिवर्ष लगभग 5 हजार करोड़ का तेल जला रहे हैं । यदि वह अपनी आवश्यकता सौर ऊर्जा से प्राप्त करते हैं तो बड़ी मात्रा में डीजल बचाया जा सकता है । सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए लोगों को इसकी ओर आकर्षित करना जरूरी है । लोग इसको समझने तो लगे हैं लेकिन इसका प्रयोग करने से कतराते हैं । छोटे स्तर पर सोलर कूकर, सोलर बैटरी, सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहन, मोबाइल फोन आदि का प्रयोग देखने को मिल रहा है लेकिन ज्यादा नहीं । विद्युत के लिए सौर ऊर्जा का प्रयोग करने से लोग अभी भी बचते हैं जिसका कारण सौर ऊर्जा का किफायती न होना है । सौर ऊर्जा अभी महंगी है और इसके प्रति आकर्षण बढ़ाने के लिए जागरूकता जरूरी है । साथ ही यदि इसे स्टेटस सिंबल बना दिया जाए तो लोग आकर्षित होंगे । समाज के कुछ जागरूक लोगों को इकट्ठा करके पहले उन्हें इसकी ओर आकर्षित किया जाए तो धीरे-धीरे और लोग भी इसका महत्व समझने लगेंगे ।

सौर ऊर्जा के क्षेत्र में सेल्को नाम की कंपनी ने अच्छा कार्य किया है । सेल्को के मालिक डॉ. हरीश हांदे ने पिछले 20-25 सालों में कंपनी को आगे बढ़ाया है । कर्नाटक के लगभग एक हजार गांवों में सौर ऊर्जा का कार्य चल रहा है । वहां अगर सभी गांवों का सौर ऊर्जा के प्रति विश्वास बढ़ा है तो उसका श्रेय सेल्को को जाता है।

सौर ऊर्जा को विकसित करने में जर्मनी ने सराहनीय कार्य किया है । जर्मनी पहले अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयात पर निर्भर था । उसने अपनी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने और ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा को विकसित किया । लगभग 10 लाख घरों में छत पर फोटोवोल्विक सेल लगाए गए जो सफल हुए । आज जर्मनी के लाखों लोगों का रोजगार अक्षय ऊर्जा से जुड़ा हुआ है ।

पवन ऊर्जा

भारत में पवन ऊर्जा की अपार क्षमताएं हैं । नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार भारत में वायु द्वारा 48,500 मेगावॉट तक बिजली उत्पादन की क्षमता है । लेकिन पवन ऊर्जा का विकास अभी धीमी गति से हो रहा है । भारत में केवल 12,800 मेगावॉट की क्षमता ही स्थापित की जा सकी है । वायु की तीव्र गति से वायु टरबाइन के घूमने से ऊर्जा प्राप्त होती है, लेकिन यह ऊर्जा वायु की गति पर निर्भर है । टरबाइन के घूमने के लिए 5.5 मीटर/सेकन्ड की रफ्तार से वायु आवश्यक है । भारत में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और राजस्थान में पवन ऊर्जा का कार्य चल रहा है । भारत में पवन ऊर्जा की काफी संभावनाएं हैं । विशेषज्ञों द्वारा उम्मीद जताई जा रही है कि अगले 10-12 वर्षों में पवन ऊर्जा की दिशा में कार्य को प्रगति मिलेगी ।

जल ऊर्जा

नदियों का बहता पानी और समुद्र से उत्पन्न ज्वारभाटा व जल तरंगें ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बन सकते हैं और इससे बड़ी मात्रा में बिजली उत्पादित की जा सकती है । वर्ष 2005 में देश की विद्युत आपूर्ति में जल ऊर्जा का योगदान 26 प्रतिशत था । देश में इससे 15 हजार मेगावॉट बिजली प्राप्त करने की संभावना है । विदित है कि जल का आवेग वायु के आवेग से भारी होता है, अतः छोटे से झरने से भी काफी बिजली बनाई जा सकती है । जल से बिजली प्राप्त करने का सबसे पुराना तरीका पन बिजली संयंत्र है जो बांध पर निर्भर होते हैं । इसके तहत नदी के पानी को बांध में एकत्रित कर लिया जाता है । इसके बाद बांध का द्वार खोल दिया जाता है और पानी तीव्र गति से पाइप में गिरता है और टरबाइन पर लगते ही टरबाइन चलने लगता है और बिजली का उत्पादन होता है । इसके अलावा छोटे-छोटे झरनों पर भी टरबाइन लगाकर बिजली बनाई जा सकती है ।

समुद्र में उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटे व लहरों से भी बिजली प्राप्त की जा सकती है । इससे ऊर्जा प्राप्त करने के लिए समुद्र के कोल पर बैराज बना दिया जाता है और उसके अंदर टरबाइन लगे होते हैं । जब ज्वार तीव्र गति से इसके अंदर प्रवेश करती है तो टरबाइन चलता है और बिजली उत्पन्न होती है । इसी तरह जब पानी वापिस बाहर आता है तब भी बिजली पैदा होती है । इसके अलावा समुद्र तट से परे पानी के भीतर चक्कियां लगाने से भी बिजली प्राप्त की जा सकती है । ये चक्कियां ज्वार-भाटे से चलती है । समुद्र में उत्पन्न होने वाली लहरों से भी बिजली प्राप्त की जा सकती है । भारत की सीमाएं तीन तरफ से समुद्र से घिरी हैं जिसके चलते भारत ऊर्जा उत्पादन में इसका विशेष लाभ उठा सकता है ।

भू-तापीय ऊर्जा

भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है । पृथ्वी के भीतर गर्म चट्टानें पानी को गर्म करती है और इससे भाप उत्पन्न होती है । ऊर्जा प्राप्त करने के लिए पृथ्वी के गर्म क्षेत्र तक एक सुरंग खोदी जाती है और इसके जरिए भाप को ऊर्जा संयंत्र तक लाया जाता है जिसके पश्चात टरबाइन घूमने लगते है । एक अनुमान के अनुसार भारत में भू-तापीय ऊर्जा के लिए 113 तंत्रों के संकेत मिले हैं जिससे लगभग 10 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन की संभावना है । भू-तापीय ऊर्जा के लिए लगभग 3 किमी. गहराई तक जमींन के भीतर खुदाई करके जांच करनी होगी लेकिन भारत के पास संसाधनों की कमी के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है । भारत के पास इतनी गहराई तक भेदन क्षमता वाली मशीन नहीं है, अतः ऐसी मशीनों का आयात कर इस स्रोत का लाभ उठाया जा सकता है ।

बायोमास एवं जैव ईंधन

भारत में जैव ईंधन की वर्तमान उपलब्धता सालाना 120-150 मिलियन मीट्रिक टन है । कृषि और वानिकी अवशेषों का प्रयोग ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किया जाता है । जैविक पदार्थों से लगभग 16 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादित की जा सकती है । भारत की लगभग 90 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या जैव पदार्थों का प्रयोग खाना बनाने, ऊष्णता प्राप्त करने में करती हैं । इसके अलावा कृषि से निकलने वाले व्यर्थ पदार्थ जैसे खाली भुट्टे, फसलों के डंठल, भूसी आदि और शहरों व उद्योगों के ठोस कचरे से भी बिजली बनाई जा सकती है । भारत में इससे लगभग प्रतिवर्ष 23,700 मेगावॉट बिजली प्राप्त की जा सकती है लेकिन अभी केवल 2,500 मेगावॉट का ही उत्पादन हो रहा है ।

गैर पारंपरिक स्रोतों से प्राप्त होने वाली ऊर्जा में लचीलापन होता है अर्थात कोयले से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए 2 हजार मेगावॉट या इससे ज्यादा का प्लांट लगाना पड़ता है जबकि गैर परंपरागत स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए एक छोटी सी इमारत में भी 15-20 मेगावॉट का प्लांट लगाया जा सकता है । इन स्रोतों को चलाने के लिए ज्यादा प्रशिक्षण की भी आवश्यकता नहीं है । कोई भी व्यक्ति इसे आसानी से चला सकता है ।

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसकी ऊर्जा आवश्यकता और पूर्ति पर निर्भर है और हमारा देश ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है । इस समय तो परमाणु ऊर्जा के लिए विदेशों के साथ हाथ मिलाया जा रहा है । जापान की त्रासदी देखने के बाद भी सरकार को यह समझ नहीं आ रहा है कि परमाणु ऊर्जा देश के लिए कितनी खतरनांक है । परमाणु ऊर्जा के लिए सरकार विदेशों के साथ समझौते कर रही हैं जिसकी एवज में भारतीय मुद्रा विदेशी हाथों में पहुंच रही है जबकि अपने पास अक्षय ऊर्जा के इतने सारे संसाधन मौजूद होने के बावजूद सरकार इसके प्रति ढुलमुल रवैया अपना रही है । भविष्य में जब गैर नवीकरणीय स्रोत खत्म होने की कगार पर होंगे तो नवीकरणीय ऊर्जा का वर्चस्व बढ़ेगा । आज भारत सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है जिसके पीछे कई वर्षों की मेहनत है । 90 के दशक में एनआईआईटी जैसे प्रशिक्षण केन्द्रों ने सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण देना शुरू किया जिसमें युवाओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया और अब भी ले रहे हैं । इसी तरह अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी प्रशिक्षण देकर कुछ लोगों का दल बनाना होगा जो इस दिशा में कार्य करें । आज भारत अपनी अक्षय ऊर्जा की क्षमताओं को पहचान लेगा तो कल पूरे विश्व के लिए आदर्श बनेगा ।

जम्मू-कश्मीर समाधान के लिए एकजुट हो देश


1947 में जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर का भारत में संपूर्ण विलय कर दिया था, लेकिन तत्कालीन नेताओं की ढुलमुल नीतियों से जम्मू-कश्मीर की समस्या विकसित हो गई । जम्मू-कश्मीर विवाद को लेकर सरकार ने आज तक कई समझौतें किए हैं और नीतियां बनाई हैं जो असफल हुई है । इन सबके चलते अलगाववादी ताकतों का मनोबल बढ़ा है जिसके कारण उनकी मांगे बढ़-चढ़ कर सामने आ रही है । वह जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने की मांग खुलेआम कर रहे हैं जिस पर हमारी केन्द्र सरकार खामोश बैठी है । हालत यह है कि राजनीतिज्ञों, अलगाववादियों व विश्व ताकतों ने मिलकर ऐसा माहौल बना दिया है जिसे देखकर प्रतीत होता है कि छोटे-मोटे समझौतों के अलावा जम्मू-कश्मीर विवाद का कोई हल नहीं है । अलगाववादियों ने मिलकर इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है जिसे हमारी सरकार ने परोक्ष रूप से स्वीकार किया है ।


जम्मू-कश्मीर विवाद

भारत-पाक के बीच जम्मू-कश्मीर विवाद अपना हित साधने के लिए पश्चिमी ताकतों की ही देन है । उनका मत था कि जम्मू-कश्मीर विवादित मुद्दा बना रहेगा तो दोनों देशों के बीच उनका दखल बना रहेगा । भारत को दो भागों में बांटने की योजना आजादी से पहले ही बना ली गई थी । ब्रिटिश साम्राज्य चाहता था कि देश छोड़ने के बाद भी यहां उनका आर्थिक और राजनीतिक दखल बना रहे । यदि सरकार ने जम्मू-कश्मीर विवाद में किसी निश्चित रणनीति के तहत काम किया होता तो यह मुददा आसानी से सुलझ सकता था।


1947 से पहले जम्मू-कश्मीर की सीमा अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, रूसी गणराज्य, तिब्बत और भारत से लगती थीं । उस समय कहा जाता था कि ‘यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां 6 साम्राज्य मिलते हैं’। अंग्रेजों ने भी अपने शासनकाल के पहले 100 सालों के बाद इस क्षेत्र का महत्व समझ लिया और उन्होंने यहां विशेष ध्यान देना शुरू किया । ब्रिटिशों ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह से इस क्षेत्र को मांगा था, लेकिन महाराजा ने यह देने से इनकार कर दिया । इसके बाद जम्मू-कश्मीर में अंग्रेजों द्वारा एक गिलगित एजेंसी बनाई गई जिसमें वहां के सभी रजवाड़ों को जोड़ दिया गया । अंग्रेजों ने हरिसिंह के साथ 60 वर्षों का समझौता किया जिसके तहत गिलगित एजेंसी में शासन तो हरिसिंह का था लेकिन सैनिक वहां ब्रिटिश तैनात थे । समझौते का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही वर्ष 1947 में भारत को आजादी मिल गई और सैनिकों ने गिलगित एजेंसी महाराजा की पूर्वानुमति के बिना ही पाकिस्तान को सौंप दी जिस पर आज तक पाक का कब्जा है । इसी क्षेत्र में चीन ने दखलअंदाजी कर अपनी चौकी और सड़क मार्ग बनाया है । जम्मू-कश्मीर विवाद को आजादी के समय ही सुलझाया जा सकता था लेकिन महाराजा और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बीच व्यक्तिगत अहंकार के कारण उन्होंने इस क्षेत्र को विवादित छोड़ दिया । वहां पर रणनीतिक तौर पर सीजफायर लागू करना सबसे बड़ी गलती थी । भारतीय सेना को यदि 48 या 72 घंटों तक लड़ने दिया होता तो भारतीय सेना सीमा तक पहुंच जाती और मुजफ्फराबाद, गिलगित भी आज भारत के कब्जे में होता। एक तथ्य और ध्यान देने वाला है कि 1947 में पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर में कोई समर्थन नहीं था लेकिन हमारे राजनीतिज्ञों की गलत नीतियों का ही नतीजा है कि पाक का समर्थन वहां धीरे-धीरे बढ़ता गया ।

26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय कर दिया था । 27 अक्टूबर 1947 को लार्ड माउण्टबेटन ने विलय पत्र स्वीकार तो किया लेकिन उन्होंने इसके जवाब में एक पत्र लिखकर जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात कही । 1 नवंबर 1947 को उन्होंने लाहौर में मोहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करते हुए जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात स्वीकार की जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने भी अपनी सहमति जताई । जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का अधिकार लार्ड माउण्टबेटन के पास नहीं था क्योंकि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय उसी तरह किया गया जिस तरह अन्य रियासतों का। भारतीय स्वाधीनता अधिनियम के तहत किसी भी रियासत को भारत या पाक में शामिल होने की स्वतंत्रता थी। इसी अधिनियम के तहत महाराजा हरिसिंह ने भी जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय किया । भारतीय स्वाधीनता अधिनियम के तहत यदि कोई जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय मानने से इनकार करता है तो उसे भारत और पाकिस्तान का विभाजन भी अस्वीकार करना होगा ।


अस्थायी अनुच्छेद-370

अस्थायी अनुच्छेद-370 के कारण ही जम्मू-कश्मीर और भारत के अन्य राज्यों के बीच एकात्मक संबंधों में बाधा आई है । इस अनुच्छेद के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य भारत से अलग प्रतीत होता है । 17 अक्टूबर 1949 को कश्मीर मामलों के मंत्री गोपालस्वामी अयंगार ने संविधान सभा में अनुच्छेद 306(ए) (वर्तमान 370) प्रस्तुत किया । उस समय कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अनुच्छेद-370 के समर्थन में अयंगार और मौलाना अबुल कलाम आजाद के अलावा और कोई नहीं था । नेहरू के सम्मान में सरदार पटेल को इस अनुच्छेद का समर्थन करने के लिए सामने आना पड़ा और कांग्रेस ने नेहरू की इच्छा का सम्मान करते हुए इस अनुच्छेद को संविधान में जोड़ दिया । अनुच्छेद 370 को जम्मू-कश्मीर में कुछ विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत लाया गया था और स्थितियां सामान्य होने पर इसे खत्म करने की बात थी । संविधान सभा द्वारा विलय पत्र का अनुमोदन किए जाने के बाद इसकी आवश्यकता नहीं थी क्योंकि जम्मू-कश्मीर का विलय भी भारत में अन्य रियासतों की तरह हुआ था लेकिन भारत के राजनीतिज्ञों ने मिलकर इस विवादित अनुच्छेद को संविधान में जोड़ दिया।


अनुच्छेद-370 के प्रावधानों के अनुसार

• संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित क़ानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए।
• इसी विशेष दर्जें के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती।
• इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बरख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।
• 1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।
• इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कही भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते हैं।
• भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 का फायदा केवल राजनीतिक पार्टियों और व्यापारियों को मिल रहा है। जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ तो अन्याय ही हो रहा है । अनुच्छेद-370 ने जम्मू-कश्मीर को आर्थिक लिहाज से पंगु बना दिया है । जम्मू-कश्मीर औद्योगिकीकरण के लिहाज से पिछड़ा हुआ है । स्थानीय लोगों के पास भी रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं है । जम्मू-कश्मीर भ्रष्ट राज्यों में शीर्ष पर है । वहां सबसे ज्यादा कर चोरी, अनुदान चोरी आदि के मामलें सामने आते है । अनुच्छेद 370 के दुष्परिणाम नीचे दिए गए हैं ।
अनुच्छेद 370 पूरे देश के नागरिकों के साथ भेदभाव करता है । इसके अनुसार जम्मू-कश्मीर का नागरिक भारत का नागरिक है लेकिन भारत का नागरिक जम्मू-कश्मीर का नहीं ।
• देशभर में पंचायत राज है जिसमें चुनाव होते है लेकिन जम्मू-कश्मीर में पंचायतों का निर्णय राज्य सरकार लेती है ।
• आजादी के बाद पश्चिम पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थी नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित है । इनमें अधिकतर हरिजन और पिछड़ी जातियों के लोग है । इन्हें सरकारी नौकरी, संपत्ति क्रय करने और स्थानीय निकायों में चुनाव का अधिकार नहीं है । इनके बच्चे छात्रवृत्ति से दूर है । इसी प्रकार देश के दूसरे हिस्सों से आए पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी भी नागरिकता के अधिकारों से वंचित हैं ।
• 1956 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मुहम्मद ने जम्मू शहर में सफाई व्यवस्था में सहयोग करने के लिए अमृतसर से 70 बाल्मिकी परिवारों को बुलाया था । उन्हें आज तक अन्य नागरिकों की तरह समान अधिकार नहीं मिले हैं । उनके बच्चें उच्च शिक्षा पाने के बावजूद भी सफाई के ही पात्र है ।
अनुच्छेद 370 महिला विरोधी भी है । जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि दूसरे राज्य में शादी करती है तो उसके जम्मू-कश्मीर में प्राप्त अधिकार स्वतः समाप्त जाते है ।
अनुच्छेद 370 के पक्ष में सरकार यह तर्क देती है कि इसे हटाने से देशभर के मुसलमान नाराज हो जाएंगे । लेकिन प्रश्न उठता है कि अनुच्छेद 370 से अन्य राज्यों के मुस्लिम क्यों नाराज होंगे ? देशभर में लागू संविधान जो पूरे देश के मुस्लिमों के हित में है वो जम्मू-कश्मीर के मुस्लिमों के हित में क्यों नहीं है?


विस्थापितों की स्थिति

जम्मू-कश्मीर विस्थापितों की भूमि बन गई है और वहां के विस्थापितों के साथ लगातार अन्याय हो रहा है । आजादी के 63 वर्षों बाद भी वह गुलामी की जिंदगी जी रहे हैं । उनको वहां न तो जमीन खरीदने का अधिकार है, न ही सरकारी नौकरी प्राप्त करने का । इनके बच्चे भी छात्रवृत्ति के अधिकारों से वंचित हैं । 1947 के बाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से लगभग 50 हजार परिवार विस्थापित होकर भारत आए, आज जिनकी जनसंख्या 12 लाख है । इनमें से ज्यादातर संख्या हिंदुओं की थी । सरकार ने पीओके से आने वाले विस्थापितों को उनकी ज़मीनों का कोई मुआवजा नहीं दिया है । इसके पीछे कारण यह है कि किसी को यह न लगे कि भारत ने पीओके से दावा छोड़ दिया है । सरकार ने इन लोगों को एक्स-ग्रेशिया देने का निर्णय किया जिसमें शर्त रखी गई कि विस्थापितों के परिवारों का मुखिया होना चाहिए । लेकिन सरकार की सूची में आज तक इन परिवारों का कोई मुखिया दर्ज नहीं है । साथ ही सरकार ने कहा कि ज्यादा आय वालों को एक्स-ग्रेशिया नहीं दिया जाएगा । इस प्रकार सरकार ने किसी भी प्रकार का मुआवजा देने से अप्रत्यक्ष रूप से अपने हाथ खींच लिए । इसी प्रकार पश्चिमी पाक के 2 लाख शरणार्थी, छम्ब विस्थापित (1971 में शिमला समझौते में पाकिस्तान को दिए जाने वाले क्षेत्र के विस्थापित, जिनकी संख्या लगभग 1 लाख है), कश्मीरी हिन्दू (लगभग 3.5 लाख) भी नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित हैं । सरकार विस्थापित हिंदू परिवारों के लिए फ्लैट्स भी केवल 100-150 के समूह में बनाती है जबकि कश्मीर में हिंदुओं की भूमि पर एक-साथ 10 हजार फ्लैट बनाए जा सकते है । इसके पीछे कारण यह है कि वह हिंदुओं को इकट्ठा नहीं होने देना चाहती ।


5 कार्य समूह

सरकार ने माना कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम जनता के साथ अन्याय हो रहा है । सरकार ने उनका समर्थन हासिल करने के लिए राउंड टेबल कांफ्रेंस बनाई जिसमें सभी पर्टियों के प्रतिनिधि बैठक के दौरान अपने विचार व्यक्त करते थे । 25 मई 2005 को आयोजित दूसरी राउंड टेबल कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विभिन्न विषयों पर विचार करने के लिए 5 कार्य समूहों की घोषणा की । इन कार्य समूहों की रिपोर्ट का समेकित रूप से विश्लेषण किया जाए तो इन्होंने अलगाववादियों की मांग से भी ज्यादा सिफारिश कर डाली । इन्होंने उपद्रवग्रस्त क्षेत्र विशेषाधिकार कानून एवं सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को हटाने, 20 साल से पाक अधिकृत कश्मीर में रह रहे आतंकवादियों के वापस आने पर आम माफी और उनका पुनर्वास, नियंत्रण रेखा के आर-पार के विधायकों का साझा नियंत्रण समूह, परस्पर दूरसंचार की सुविधा और सीमा पार आवागमन की खुली छूट आदि सुझाव दिए ।

पिछले साल जम्मू-कश्मीर में हुई गोलीबारी के बाद संयुक्त संसदीय समिति ने भी जम्मू-कश्मीर का दौरा किया । जहां मीरवाईज और गिलानी जैसे अलगाववादियों ने कश्मीर को पाक में मिलाने का राग अलापा। सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर फैसले के लिए अधिकार प्राप्त समूह की जरूरत महसूस की जिसके बाद दिलीप पडगांवकर, राधा कुमार और एम.एम. अंसारी को वार्ताकार के तौर पर नियुक्त किया गया । असल में सरकार ने कानूनी तौर पर अपनी बात मनवाने के लिए वार्ताकार नियुक्त किए जिससे लोग उनके फैसलों का ज्यादा विरोध न करें । यह वार्ताकार भी अलगाववादियों की ही भाषा बोल रहे हैं । इन्होंने जम्मू-कश्मीर समस्या के निवारण के लिए पाक के साथ वार्ता पर बल दिया है । वार्ताकारों की रिपोर्ट में कुछ सुझाव आने की संभावना है जिसमें यह भारत और पाक दोनों के कश्मीर को अधिक स्वायत्ता देने का सुझाव दे सकते है । साथ ही एक ऐसा समूह बनाने की मांग कर सकते है जो भारत और पाक अधिकृत दोनों कश्मीर में सेवाओं को देखे जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि । यदि ऐसा होता है तो भारत के कश्मीर और पीओके से कोई भी एक-दूसरे के स्थान पर आ-जा सकता है । ऐसे में मामूली पारदर्शिता होने के चलते पाकिस्तान से और भी बहुत कुछ आ सकता है जिसका भारी खामियाजा भारत को भुगतना पड़ सकता है।

कश्मीर समस्या के समाधान के लिए जरूरी है कि अनुच्छेद 370 और अलग झंडे के प्रावधान को हटाया जाए क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर राज्य को पूरे देश से पृथक करते है । अनुच्छेद 370 को संसद द्वारा पारित किया गया था और संसद ही इसे हटा सकती है । लोकसभा दो-तिहाई बहुमत से इस अनुच्छेद को हटा सकती है लेकिन इसके लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा से दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है । अब यहां एक प्रश्न उठता है कि विधानसभा की शक्तियां गवर्नर के पास होती है । क्या गवर्नर की सिफारिश पर अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए लोकसभा में विधेयक नहीं पारित किया जा सकता है?


यह कार्य थोड़ा कठिन जरूर है लेकिन इसके लिए जम्मू-कश्मीर के लोगों समेत पूरा देश एकजुट हो तो सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है । इसके लिए देश भर के लोगों को यह सोचना होगा कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है । जम्मू-कश्मीर के लोगों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त है जबकि अन्य राज्यों के नागरिकों को नहीं । जम्मू-कश्मीर के नागरिक पूरे देश के नागरिक है लेकिन पूरे देश के नागरिक जम्मू-कश्मीर के नहीं । पूरा देश एकजुट हो जाता है तो सरकार पर अस्थायी अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए दबाव बनाया जा सकता है ।
अतः कश्मीर समस्या के हल के लिए पूरे देश को सोचना होगा क्योंकि सरकार के लिए जम्मू-कश्मीर प्राथमिकता नहीं है उनके लिए चुनाव प्राथमिकता है । हां सरकार पर यदि चुनावी तौर पर दबाव बनाया जाए तो वह इस समस्या पर विचार कर सकती है, वरना इसकी संभावाना न के बराबर है ।


Thursday, April 7, 2011

सूरज से निकलेगी भारत के भविष्य की रोशनी


भारत जैसे विकासशील देश को एक ओर जहां विश्व की उभरती शक्ति के रूप में देखा जा रहा है वहीं दूसरी ओर अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने वाले ऊर्जा के क्षेत्र में कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है । भारत की जनता का 40 प्रतिशत भाग अभी भी विद्युत के बिना जीवनयापन कर रहा है जबकि गांवों में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों को बिजली नसीब नहीं हो रही है । विद्युत आपूर्ति के लिए भारत अभी भी पारंपरिक थर्मल स्रोतों जैसे कोयला, प्राकृतिक गैस, तेल आदि पर निर्भर है जबकि अगले 40 वर्षों में इन स्रोतों का अस्तित्व खतरे में है । भारत के सामने एक चुनौती इन स्रोतों को भावी पीढ़ी के लिए सहेज कर रखने की है, तो दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए इन स्रोतों पर से निर्भरता कम करनी होगी । ऐसे में भारत को अक्षय स्रोतों से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को स्थापित करना होगा जिसमें सौर ऊर्जा प्रमुख है। भारत को सौर ऊर्जा में निवेश करने की जरूरत है जिससे भारत का भविष्य सुरक्षित हो सके ।

वहीं विद्युत आपूर्ति के लिए भारत दूसरे देशों पर भी निर्भर है । वर्ष 2007 के आंकड़ों पर गौर करें तो 80 प्रतिशत विद्युत पारंपरिक थर्मल स्रोतों से प्राप्त की गई जबकि 16 प्रतिशत ऊर्जा जल विद्युत से प्राप्त की गई। जियोथर्मल व अन्य अक्षय स्रोतों से केवल 2-2 प्रतिशत ऊर्जा प्राप्त की गई। उल्लेखनीय है कि भारत की 70 प्रतिशत विद्युत आपूर्ति कोयले पर निर्भर है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक देश है, वहीं कोयले के उपभोग में भी भारत को तीसरा स्थान प्राप्त है। बिजली आपूर्ति के लिए भारत को बहुत बड़ी मात्रा में कोयले का आयात करना पड़ता है। कोल इंडिया लि. के अध्यक्ष पार्थ भट्टाचार्य ने हाल ही में बताया था कि मार्च 2011 तक कोयले का आयात 10 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जबकि वर्ष 2009 में भारत ने कुल 5 करोड़ 90 लाख टन कोयले का आयात किया था। भारत इस समय लगभग 1 लाख 50 हजार मेगावॉट बिजली का उत्पादन कर रहा है, वहीं तेजी से विकास के चलते वर्ष 2015 में विद्युत की मांग 3 लाख मेगावॉट तक पहुंचने की संभावना है। ऐसे में भारत को अपनीऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वयं पर निर्भर होना होगा जिससे भविष्य में भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हो सके, क्योंकि किसी भी देश की ऊर्जा की मांग व खपत अर्थव्यवस्था को विशेष रूप से प्रभावित करती है।
सूरज की रोशनी से संपन्न भारत ने सौर ऊर्जा के महत्व को समझ लिया है। नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज (एनएपीसीसी) भारत में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 तक सौर ऊर्जासे केवल 20 हजार मेगावॉट बिजली ही प्राप्त हो सकेगी जो भारत की विद्युत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं है । इस क्षेत्र में सरकार को अधिक निवेश की जरूरत है। वर्तमान समय में सौर ऊर्जा की लागत ज्यादा होने के कारण भारत के लोग इसकी ओर आकर्षित नहीं हो रहे हैं । सौर ऊर्जा की लागत 17 से 22 रूपये प्रति यूनिट पड़ती है। सरकार को सौर ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश कर सौर ऊर्जा को सस्ता बनाने के प्रयास करने चाहिए। भारत की 6 करोड़ 75 लाख ग्रामीण जनसंख्या और 37 लाख शहरी जनसंख्या विद्युत के लिए मिट्टी के तेल का प्रयोग करती हैं। इसकी जगहसौर ऊर्जा से जलने वाली लालटेनों को बढ़ावा दिया जाए तो कच्चे तेल की बचत की जा सकती है। वहीं सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों व अन्य सामानों को भी बढ़ावा देना आवश्यक है जिससे कच्चे तेल पर से निर्भरता कम होने के साथ-साथ वातावरण भी स्वच्छ रहे। भारत में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए फोटोवोल्विक प्रणाली विकसित किए जाने की जरूरत है।

आज विश्व में ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति खाड़ी देश (ईरान, यूएई, ओमान, बहरीन, कतर, सऊदी अरब और कुवैत) कर रहे हैं क्योंकि वहां कच्चे तेल, कोयला, खनिजों आदि के भंडार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और इन्हीं भंडारों के कारण खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत है। विकसित देश ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर हैं जिसके कारण ये देश विश्व नीतियों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। भविष्य पर गौर किया जाए तो अगले 40 वर्षों के दौरान गैर नवीकरणीय स्रोत जैसे कोयला, पेट्रोल आदि का अस्तित्व खतरे में है जिसका प्रभाव खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पर विशेष तौर पर पड़ने वाला है। ऊर्जा के इन संसाधनों की समाप्ति के साथ ही खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। ऐसे में भारत ऊर्जा के क्षेत्र में विश्व शक्ति के रूप में बनकर उभर सकता है। भारत के पास अक्षय स्रोत प्रचुर मात्रा में उपल्ब्ध है और मजबूत नीतियों और निवेश के साथ सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, महासागर तरंगों से प्राप्त ऊर्जा, हाइड्रोजन ऊर्जा को विकसित कर अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की जा सकती है। वहीं विश्व की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी भारत आगे बढ़ सकता है। ऐसा यदि संभव होता है तो एक ओर जहां अभी भारत ऊर्जा आपूर्ति के लिए आयात पर निर्भर है, वहीं भविष्य में यह ऊर्जा हब बन सकता है और विश्व के अन्य देशों को भी ऊर्जा निर्यात कर सकता है। इससे भारत का विश्व की नीतियों में भी सक्रिय योगदान बढ़ेगा क्योंकि सुदृढ़ अर्थव्यवस्था वाले देशों का वैश्विक नीतियों पर विशेष प्रभाव पड़ता है।
इस बेहतर भविष्य के लिए अभी से कवायद किए जाने की जरूरत है। इसके लिए भारत को अक्षय स्रोतों से प्राप्त ऊर्जाको बढ़ावा देने के साथ-साथ ऊर्जा की बचत भी करनी होगी। वैसे भी भारत अपनी बचत प्रवृत्ति की आदतों के कारण ही वैश्विक मंदी से उबर पाया है। इसके लिए सरकार को सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देना होगा और सरकार को भी सार्वजनिक वाहनों में निवेश अधिक करना होगा जिससे भारत में सार्वजनिक वाहनों की संख्या बढ़ें और लोग निजी वाहनों के स्थान पर सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करें। वाहनों की संख्या पर गौर किया जाए तो भारत में जहां वर्ष 1980 में केवल 30 लाख निजी वाहन थे वहीं वर्ष 2005 तक इनकी संख्या 7 करोड़ 20 लाख तक पहुंच गई है और सकल घरेलू उत्पाद में 6 प्रतिशत तक वृद्धि के साथ वर्ष 2030 में निजी वाहनों की संख्या 70 करोड़ 80 लाख तक पहुंचने की संभावना है। वाहनों की संख्या कम करना भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। इसके लिए निजी वाहनों पर करों में वृद्धि करके और सार्वजनिक वाहनों की संख्या में इजाफा कर स्थिति काबू में की जा सकती है। ऊर्जाके क्षेत्र में भारत को मजबूती प्रदान करने के लिए टेरी (द एनर्जी एंड रिसॉर्स इंस्टीट्यूट) ने सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं जिसमें सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना, कोयला पर से निर्भरता कम कर इसे भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित करना, ग्रामीण क्षेत्रों में जैव आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना शामिल है। टेरी ने एलपीजी, मिट्टी के तेल और बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी को भी खत्म करने की सलाह दी है क्योंकि इसका लाभ आम लोगों तक न पहुंचकर बिचौलियों तक पहुंचता है। टेरी का कहना है कि लोगों को बायोमीट्रिक कार्ड के जरिए सीधा लाभ पहुंचाना चाहिए। वहीं सरकार को भी लोगों को बिजली बचत के प्रति जागरूक करने के प्रयास करने चाहिए ।