Wednesday, August 17, 2011

कलम का सिपाही, मौत का राही



राष्ट्र की रक्षा के लिए सेना के बाद दूसरा स्थान पत्रकार का आता है। अपनी कलम की ताकत से वह भ्रष्टाचार एवं देश की सुरक्षा पर सेंध लगाने के लिए गिद्ध की तरह नजर गड़ाएं बैठे असामाजिक तत्वों पर अपनी पैनी नजर रख उन्हें उजागर करता है। लेकिन कभी-कभी कलम के सिपाही पत्रकार की खुद की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। सत्य को उजागर करने पर कई लोग उसके जान के दुश्मन बन जाते हैं। विडंबना यह है कि सेना के पास तो आत्मरक्षा के लिए हथियार है लेकिन पत्रकार के पास केवल कलम, जो सत्य उजागर करने के लिए तो एक सशक्त हथियार है लेकिन आत्मरक्षा के लिए नहीं। जब कोई उसकी हत्या के इरादे से उसे निशाना बनाता है तो वह आत्मरक्षा में असमर्थ होता है। पत्रकार को अपना कार्य करते समय यदि कोई मारता है तो मरने के बाद उसे वो सम्मान प्राप्त नहीं होता जो एक सैनिकों को प्राप्त होता है, जबकि दोनों का काम जोखिमपूर्ण और राष्ट्रवाद से ओत प्रोत होता है।

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले भारत में अभी तक पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने वाला कोई ठोस कानून नहीं है। सत्य की कलम से लिखने वाले पत्रकार पर मौत का साया हरदम मंडराता रहता है। पत्रकारों की सुरक्षा से संबंधित कानून को जब भी लाने की बात की गई तो उस पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया। आखिर ऐसा क्या है, जो देश की सत्ता पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होने देती? क्यों कानून लाने की बात पर वह चुप्पी साध लेती है? भारत के संविधान में जहां सूचना लेने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, वहां इस अधिकार के कई बार हनन के बावजूद सरकार क्यों कुछ नहीं करती? क्या यह लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों पर प्रश्न चिन्ह नहीं है?

हाल ही में खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या ने इन प्रश्नों को एक बार फिर से उजागर कर दिया है। डे की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अंडरवर्ल्ड की गतिविधियों को उजागर करने वाले डे ने तेल माफियाओं के काले धंधे को भी उजागर किया था। वह चंदन की तस्करी का खुलासा भी करना चाहते थे। इतने बड़े स्तर पर हो रही इन गतिविधियों को उजागर करने की कीमत डे को अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी। जे डे की हत्या के पीछे कभी तेल माफियाओं ,तो कभी अंडरवर्ल्ड का हाथ बताया जा रहा है । लेकिन सबसे शर्मनाक बात है कि मुंबई सरकार इस हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने से मना कर रही है जबकि मुंबई पुलिस से अभी तक यह मामला सुलझ नहीं सका। ज्यादा समय बीतने पर हत्या के आरोपी सभी सबूत मिटाने में सफल हो जाएंगे। आखिर ऐसा क्या है जो सरकार इस मामले की सीबीआई जांच कराने से कतरा रही है? इससे पहले पाकिस्तान के पत्रकार सलीम शहजाद को भी मार दिया गया था। उन्होंने अलकायदा और पाकिस्तानी सेना के बीच संबंधों को उजागर किया था।

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी संस्था सीपीजे के मुताबिक भारत में वर्ष 1992 से लेकर अब तक कुल 44 पत्रकार मारे जा चुके हैं,जिनमें से केवल 27 पत्रकारों की मौंत की गुत्थी ही सुलझ पाई है। इन पत्रकारों की सूची नीचे दी गई है।

1. ज्योतिर्मय डे - मिडडे, 11 जून 2011, मुंबई,गोली मारकर हत्या

2. उमेश राजपूत - नई दुनिया, 22 फरवरी 2011, रायपुर,गोली मारकर हत्या

3. विजय प्रताप सिंह- इंडियन एक्सप्रेस, 20 जुलाई 2010, इलाहबाद, कैबिनेट मंत्री नन्द गोपाल गुप्ता पर हुए हमले में मौत

4. हेमन्त पांडे - फ्रीलांसर, 2 जुलाई 2010, आन्ध्र प्रदेश, माओवादियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ के दौरान मौत

5. विकास रंजन - हिन्दुस्तान, 25 नवंबर 2008, रौसेरा, मोटरबाइक सवार तीन युवकों द्वारा गोली मारकर हत्या

6. जगजीत सैकिया - अमर असम, 20 नवंबर 2008, असम, गोली मारकर हत्या

7. जावेद अहमद मिर - डेली ट्रिब्यून,13 अगस्त 2008, जम्मू-कश्मीर, अलगाववादियों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस मुठभेड़ में मौत

8. अशोक सोढी - डेली एक्सेल्सर, 11 मई 2008, जम्मू-कश्मीर, आतंकी मुठभेड़ के दौरान फोटोग्राफर सोढी की मौत

9. मोहम्मद मुस्लिमुद्दीन - असमिया प्रतिदिन,1 अप्रैल 2008, असम,छः हमलावरों द्वारा गोली मारकर हत्या

10. अरूण नारायण देकाते - तरूण भारत, 10 जून 2006, नागपुर, चार अज्ञात युवकों द्वारा हमला

11. प्रहलाद गौला - असमिया खबर, 6 जनवरी 2006, असम, चाकू मारकर हत्या

12. दिलीप मोहापात्र - अजी कगोज, 8 नवंबर 2004, उड़ीसा, अपहरण कर हत्या

13. असिया जिलानी - फ्रीलांसर, 20 अप्रैल 2004, कश्मीर, बम धमाके में मौत

14. वीराबोएना यदागिरी - आन्ध्र प्रभा, 21 फरवरी 2004, आन्ध्र प्रदेश, चाकू मारकर हत्या

15. परमानंद गोयल - पंजाब केसरी, 18 सितंबर 2003, हरियाणा, तीन अज्ञात युवकों द्वारा गोली मारकर हत्या

16. इंद्रा मोहन हकसम - अमर असम, 24 जून 2003, असम, उल्फा द्वारा अपहरण कर हत्या

17. परवाज़ मोहम्मद सुल्तान - नाफा समाचार संगठन, 31 जनवरी 2003, श्रीनगर, गोली मारकर हत्या

18. रामचंद्र छतरपति - पूरा सच, 21 नवंबर 2002, हरियाणा, गोली मारकर हत्या

19. यम्बेम मेघजीत सिंह - नॉर्थईस्ट विजन, 13 अक्टूबर 2002, मणिपुर, प्रताड़ना के पश्चात गोली मारकर हत्या

20. पारितोष पांडे - जनसत्ता एक्सप्रेस, 14 अप्रैल 2002, लखनऊ,गोली मारकर हत्या

21. मूलचंद यादव - फ्रीलान्सर, 30 जुलाई 2001, झांसी, गोली मारकर हत्या

22. थऊनाओजम ब्रजमणि सिंह - मणिपुर न्यूज, 20 अगस्त 2000, मणिपुर, गोली मारकर हत्या

23. प्रदीप भाटिया - द हिन्दुस्तान टाइम्स, श्रीनगर, 10 अगस्त 2000, बम धमाके में भाटिया समेत छः अन्य पत्रकारों की मौत

24. वी. सेल्वरज - नक्कीरन, 31 जुलाई 2000, तमिलनाडु, चाकू मारकर हत्या

25. अधीर राय - फ्रीलांसर, 18 मार्च 2000, झारखंड, गोली मारकर हत्या

26. एन.ए. लालरूहलू - शान, 10 अक्टूबर 1999, मणिपुर, गोली मारकर हत्या

27. इरफान हुसैन - आउटलुक, 13 मार्च 1999, नई दिल्ली, अपहरण कर चाकू मारकर हत्या

28. शिवानी भटनागर - इंडियन एक्सप्रेस, 23 जनवरी 1999, नई दिल्ली, चाकू मारकर हत्या

29. एस. गंगाधर राजू - ईटीवी, 19 नवंबर 1997, हैदराबाद, कार बम धमाके में मौंत

30. एस. कृष्णा - ईटीवी, 19 नवंबर 1997, हैदराबाद, कार बम धमाके में मौंत

31. जी. राजशेखर - ईटीवी, 19 नवंबर 1997, हैदराबाद, कार बम धमाके में मौत

32. जगदीश बसु - ईटीवी, 19 नवंबर 1997, हैदराबाद, कार बम धमाके में मौत

33. पी. श्रीनिवास राव - ईटीवी, 19 नवंबर 1997, हैदराबाद, कार बम धमाके में मौत

34. सईदन शफि - दूरदर्शन टीवी, 16 मार्च 1997, श्रीनगर, गोली मारकर हत्या

35. अल्ताफ अहमद फक्टू - दूरदर्शन टीवी, 1 जनवरी 1997, श्रीनगर, गोली मारकर हत्या

36. पराग कुमार दास - असमिया प्रतिदिन, 17 मार्च 1996, असम, गोली मारकर हत्या

37. गुलाम रसूल शेख - रहनुमा-ए-कश्मीर, 10 अप्रैल 1996, कश्मीर, अपहरण कर हत्या

38. मुस्ताक अली - एजेन्सी फ्रांस प्रेस, एशियन न्यूज इंटरनेशनल, 10 सितंबर 1995, श्रीनगर,लेटर बम

धमाके में मौत

39. गुलाम मुहम्मद लोने - फ्रीलांसर, 29 अगस्त 1994, कश्मीर, गोली मारकर हत्या

40. दिनेश पाठक - संदेश, 22 मई 1993, बड़ोदा, चाकू मारकर हत्या

41. भोला नाथ मासूम - हिंद समाचार, 31 जनवरी 1993, राजपुर, गोली मारकर हत्या

42. एम.एल. मनचंदा - ऑल इंडिया रेडियो, 18 मई 1992, पंजाब, अपहरण कर हत्या

43. राम सिंह बिलिंग - अज़दी आवाज़, डेली अजीत, 3 जनवरी 1992, जालंधरहिरासत में मौत

44. बख्शी तीरथ सिंह - हिन्द समाचार, 27 फरवरी 1992, धुरी अज्ञात युवकों द्वारा हत्या

इन पत्रकारों में से अधिकतर पत्रकारों की हत्या गोली मारकर की गई है। अपहृत हुए पत्रकारों को तो बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया है। इसके अलावा पत्रकारों पर हमलों की खबरें तो आती ही रहती है। हाल ही में यूपी पुलिस द्वारा किया गया पत्रकार पर हमला, छत्तीसगढ़ में असामाजिक तत्वों द्वारा पत्रकारों पर हमलों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

पत्रकारिता की नींव राष्ट्रवाद, समाज के सही दिशा निर्माण और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए रखी गई थी। पत्रकारों को संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों की धारा 19(1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इसी के तहत वह निर्भीकतापूर्वक अपनी बात को देश के सामने रखता है। लेकिन पत्रकारों की इस स्वतंत्रता को चोट पहुंचाई जा रही है और उसकी आवाज को दबाने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा है। यह संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार का उल्लंघन तो है ही, लोकतंत्र पर भी आघात है। यदि इसी तरह पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं होती रही तो बहुत कम पत्रकार निर्भीक छवि वाले बचेंगे। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी लड़खड़ा जाएगा। आज पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और इससे सम्बन्धित उपयोगी कानून लाने की जरूरत है जिससे पत्रकार निर्भीकतापूर्वक अपने विचार व्यक्त कर सकें।

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मीडिया समाज हित से कट गया है- जवाहर लाल कौल


पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और उसमें आई विसंगतियों के कारण आज पत्रकारिता एवं पत्रकारों पर कई तरह के लांछन लगाए जा रहे हैं। आज पत्रकारों एवं समाचार-पत्रों द्वारा व्यक्तिगत एवं संस्थागत लाभ के लिए सामाजिक एवं राष्ट्रीय हित के साथ-साथ सामुदायिक कल्याण की भावना के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है। क्या ऐसे में पत्रकारिता को जनचेतना एवं परिवर्तन का औजार बनाने वाले क्रांतिकारी पत्रकारों द्वारा स्थापित परंपरा के प्रति न्याय हो रहा है? स्वाधीनता दिवस की 64वीं वर्षगांठ पर जाने माने पत्रकार जवाहर लाल कौल जी से इस विषय पर उनकी राय जानने का हम प्रयास कर रहे हैं।

प्रश्न 1. 60 के दशक में पत्रकारिता में ऐसा क्या आकर्षण रहा जो आप इस क्षेत्र में आए? इस क्षेत्र में आपका कैसा अनुभव रहा?

उत्तर- पत्रकारिता में आने से पहले मैं सामाजिक संस्थाओं में काम करता था। इसलिए मुझे ऐसा लगा कि पत्रकारिता के माध्यम से मैं समाज के प्रति अपने सेवा भाव को पूरा कर सकता हूं। उस समय पत्रकारिता में जितना आज आकर्षण है, जैसे मनोरंजन, शान-ओ-शौकत और जो दूसरी चीजें दिखाई देती हैं, वह नहीं था। फिर भी उस समय यह आकर्षण था कि इसमें व्यक्ति अपने मन की बात दूसरों को सुना सकता है और सामाजिक दायित्व पूरा कर सकता है। इसीलिए मैं इस क्षेत्र में आया।

प्रश्न 2. पत्रकारिता के शुरूआती दौर से लेकर अब तक पत्रकारिता जगत में आप क्या बदलाव देखते हैं?

उत्तर- जब मैं पत्रकारिता में आया था तो पत्रकारिता में जो मिशन की भावना थी, समाज व उद्देश्य के प्रति काम करने की इच्छा थी वो कुछ-कुछ जीवित थी। पत्रकारिता में वे ही लोग आते थे जो समाज को कुछ देने की इच्छा रखते थे, कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकते थे। पारिवारिक जीवन की असुविधाओं को भी झेल सकते थे। तब तथ्य के साथ खिलवाड़ करना गलत माना जाता था। पत्रकारों का काम सच्चाई को सामने लाना और अपनी ओर से कम से कम प्रतिक्रिया देना होता है, लेकिन धीरे-धीरे पत्रकारिता में व्यापार का तत्व बढ़ने लगा। अखबारों का उत्पादन महंगा हो गया। इसका असर पत्रकारिता पर पड़ा। संचालक व मालिक मानने लगे कि समाचार पत्र उद्योग है और इसका काम पैसा कमाना है। पैसा कमाने के लिए लोगों को आकर्षित करना होता है जिसके चलते पत्रकारिता में एक शब्द आया इन्फोटेन्मेंटया सूचनारंजन। इसमें भी धीरे-धीरे सूचना तत्व कम होता गया और मनोरंजन का तत्व बढ़ता गया। इसीलिए सच्चाई और तथ्य पिछड़ते गए। सामान्य पत्रकार और संपादक भी तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने की छूट पाने लगे। एक और महत्वपूर्ण बात इसी बीच हुई-टेलीविजन का प्रसार। किसी जमाने में अखबारी भाषा को दूसरे दर्जे की भाषा कहा जाता था। जर्नलिस्टिक लैंग्वेजको हल्का-फुल्का माना जाता था जिसे टेलीविजन ने और हल्का कर दिया। भाषा तथ्यों पर आधारित न होकर अतिरंजना पर आधारित हो गई। पत्रकारिता ग्लैमर का व्यवसाय बन गई, ऐसे व्यवसाय में पैसे का लोभ होना स्वाभाविक है, इसीलिए पत्रकारिता समाजोन्मुख नहीं रह गई है।

प्रश्न 3. जम्मू-कश्मीर पर आपने गहन अध्ययन किया है। क्या आपको लगता है कि देश के अन्य भागों में रहने वाले नागरिकों को वहां की वास्तविक जानकारी समाचार पत्रों व चैनलों के माध्यम से हो पा रही है? अगर नहीं तो क्या और कैसे होना चाहिए?

उत्तर- मीडिया व्यापक समाज हित से कट गया है। बड़े अखबार केवल उन्हीं पाठकों तक पहुंचना चाहते है जो पाठक महंगे संसाधनों को खरीद सकते हैं और जिनके कारण बड़े-बड़े विज्ञापन प्राप्त हो सकते हैं। जिन्हें हम राष्ट्रीय समाचार पत्र कहते हैं उनमें इस बात की होड़ होती है कि वह अधिक से अधिक आर्थिक रूप से संपन्न शहरी खरीदारों को ही जुटाएं। स्पष्ट है कि समाचार देते वक्त या घटनाओं पर अपना मत व्यक्त करते समय ऐसे ही पाठकों या वर्गों का हित सर्वोपरि होता है। इस तरह समाचार देने से पूरे देश के संदर्भ में हो रही घटनाओं का सही-सही चित्रण संभव नहीं है। जम्मू-कश्मीर के सिलसिले में समाचार पत्रों में अधिकतर उन ही वर्गों और गुटों के बारे में समाचार आते हैं जो हिंसा का सहारा लेते हैं, जो नकारात्मक गतिविधियों में लिप्त हैं या जो चौंकाने वाले बयान देते हैं। इस तरह जो चित्र बनता है वो न तो पूरा होता है, न सच्चा। जम्मू-कश्मीर के बारे में मीडिया की भूमिका अक्सर उत्तरदायित्वपूर्ण नहीं रही है जिससे देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों में अनेक तरह की भ्रांतियां पैदा हो गई हैं।

प्रश्न 4. जम्मू-कश्मीर की ऐसी क्या स्थिति है जो मीडिया द्वारा सामने नहीं लाई जा रही है?

उत्तर- जम्मू-कश्मीर में कई तरह के लोग रहते हैं। उत्तर-पश्चिमी पहाड़ों में लद्दाख का बहुत बड़ा क्षेत्र है जहां का प्रमुख धर्म, बौद्ध धर्म है। दक्षिण में जम्मू का विशाल क्षेत्र है। घाटी और जम्मू की पहाड़ियों में गुजर और बकरवाल रहते हैं। कश्मीर घाटी में भी दो मुस्लिम संप्रदाय के लोग हैं-शिया और सुन्नी। इन सब में केवल सुन्नी संप्रदाय का एक वर्ग भारत विरोधी गतिविधियों में सक्रिय है और कुछ लोग हिंसक राजनीति कर रहे हैं। यानि पूरे राज्य की आबादी के 10 प्रतिशत लोगों की गतिविधियां ही मीडिया की रूचि का विषय है। शेष सभी वर्गों की आवाज अनसुनी कर दी जाती है।

प्रश्न 5. जम्मू-कश्मीर की स्थानीय मीडिया के बारे में आपकी क्या राय हैं?

उत्तर- जम्मू-कश्मीर की त्रासदी है कि कश्मीरी भाषा की कोई लिपि नहीं है। जो प्राचीन लिपि थी, वह शारदाकहलाती थी। आजादी के बाद वहां के सत्ताधारियों ने उर्दू, फारसी पर आधारित एक लिपि का विकास किया लेकिन यह लिपि अवैधानिक होने के कारण नहीं चल पाई। परिणामतः प्राचीन और संपन्न होने के बावजूद कश्मीरी में लोकप्रिय पत्रकारिता पनप नहीं पा रही। वर्तमान समय में जितने भी समाचार पत्र वहां छप रहे हैं वह उर्दू या अंग्रेजी भाषा में हैं। इसीलिए आम लोगों तक पत्रकारिता नहीं पहुंच पा रही है।

प्रश्न 6. जम्मू-कश्मीर के समाचार पत्रों का क्या दृष्टिकोण हैं?

उत्तर- वहां भी पत्रकारिता का वही रूप है जो देश में है। अलग-अलग हितों के पत्र-पत्रिकाएं मौजूद हैं। कुछ अलगाववादियों का समर्थन करते हैं, तो कुछ राष्ट्रीय दृष्टिकोण को सामने लाते हैं। इनमें भी क्षेत्रीय विभिन्नता है। कश्मीर की पत्र-पत्रिकाएं अलगाववाद से प्रभावित है जबकि जम्मू में राष्ट्रीय पक्ष को प्रमुखता दी जाती है।

प्रश्न 7. वर्तमान विदेश नीति को आप किस प्रकार देखते हैं?

उत्तर- वर्तमान विदेश नीति में किसी सकारात्मक पहल का सर्वथा अभाव है। विदेश नीति किसी देश की सुरक्षा नीति का आयाम होती है, लेकिन दुर्भाग्य से इस समय भारत चारों ओर से ऐसे देशों से घिरा हुआ है जो शत्रुवत व्यवहार कर रहे हैं। बड़े देशों की बात तो अलग, नेपाल, बांग्लादेश जैसे छोटे देश भी भारत के हितों के विपरीत नीतियां अपना रहे हैं। यह हमारी विदेश नीति की असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि भारत अपने ही आंगन में अकेला पड़ गया है।

प्रश्न 8. पत्रकारिता और बाजार के बीच संबंधों पर आपने गहन अध्ययन किया है। आपकी राय में बाजार किस तरह पत्रकारिता को प्रभावित कर रहा है?

उत्तर- पत्रकारिता बाजार का ही हिस्सा है। जिस समय पत्रकारिता एक मिशन थी, उस समय पत्रकार एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हुआ करता था। अब महंगी टेक्नोलॉजी और व्यापक प्रसार संख्या के कारण मीडिया पर पूंजीपतियों और व्यापारिक निगमों का वर्चस्व हो गया है। इसलिए आज के उपभोक्ता समाज में मीडिया बाजार पर न केवल आश्रित है बल्कि बाजार के हितों का संरक्षण करती है।

प्रश्न 9. प्रधानमंत्री मनामोहन सिंह ने मीडिया पर आरोप लगाया है कि ‘‘मीडिया देश की समस्याओं को लेकर जजकी भूमिका अदा कर रहा है।’’ क्या सरकार मीडिया पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रही है?

उत्तर- सरकार को मीडिया पर नियंत्रण करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि सरकार जिस उपभोक्तावाद का स्वयं प्रसार कर रही हैं उसी उपभोक्तावाद का माध्यम देश के अखबार भी है। सरकार इस बात को समझती है कि मीडिया को परोक्ष रूप से प्रभावित करना आसान है लेकिन प्रत्यक्ष नियंत्रण सरकार के लिए भी खतरनाक हो सकता है।

प्रश्न 10. व्यवस्था परिवर्तन को लेकर देशभर में चल रही बहस पर मीडिया के नजरिए को आप किस परिप्रेक्ष्य में देखते हैं?

उत्तर- व्यवस्था परिवर्तन मीडिया के लिए एक खबर है। वर्तमान व्यवस्था को बदलने की न तो मीडिया में इच्छा है और न ही क्षमता।

प्रश्न 11. ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्डसाप्ताहिक पत्र के बंद होने की घटना को मूल्य आधारित पत्रकारिता की समाप्ति की घोषणा मान सकते है?

उत्तर- ऐसी सारी पत्रिकाओं के बंद होन से ये तो पता लगता ही है कि मुनाफे के इस व्यापार में केवल सामाजिक दायित्व का काम करना कितना कठिन हो गया है।

प्रश्न 12. आपके विचार में भारत की भावी दिशा क्या होनी चाहिए और यह कैसे संभव है?

उत्तर- जब 1947 में हमारा देश आजाद हुआ तो हमने अपनी दिशा तय नहीं की क्योंकि हमने ऐसी व्यवस्था अपना ली जो पहले से बनी हुई थी। हम लगभग उसी दिशा में चल रहे थे जिसमें आजादी से पहले चलते थे। इसीलिए अगर देश को बदलना है तो यह मानकर चलना होगा कि जिस तरह की व्यवस्था अपनानी है वह यहीं की परिस्थितियों, यहीं की मनीषा और यहीं के सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित हो सकती हैं। दिशाएं स्वयं बनाई जाती हैं, आयातित नहीं होती।



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सामाजिक आंदोलन और न्यू मीडिया


समाचार पत्रों और चैनलों में व्यावसायीकरण के प्रभाव के कारण निष्पक्ष विचारों का प्रभाव बहुत कम होता जा रहा है। निष्पक्ष विचार रखने वालों को मीडिया जगत में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में न्यू मीडिया एक वरदान के रूप में उभर कर सामने आया है। सस्ता व सुलभ संचार माध्यम होने के कारण इसने काफी कम समय में प्रसिद्धि पाई है। वहीं न्यू मीडिया ने सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है।

अरब देशों में हुई जनक्रांति के पीछे न्यू मीडिया का बड़ा योगदान रहा है। सरकार द्वारा समाचार पत्रों और चैनलों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वहां की जनता एक-दूसरे से सोशल साइटों के जरिए जुड़ी और जनक्रांति को एक नई दिशा मिली। भारत में भी पिछले कुछ दिनों में हुए आंदोलनों में न्यू मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आरूषि तलवार को इंसाफ दिलाने के लिए कैंडल लाइट मार्च से लेकर अन्ना हजारे व बाबा रामदेव के आंदोलनों में जनसमर्थन प्राप्त करने के लिए न्यू मीडिया के माध्यम से लोगों से संपर्क साधा गया। इसके लिए एक ओर फेसबुक जैसी सोशल साइट पर एक पेज बनाकर लोगों को आंदोलन व उसके समय, स्थान की जानकारी दी गई, वहीं मोबाइल फोन पर भी एसएमएस द्वारा लोगों को सूचित किया गया। फेसबुक, ऑरकुट व ट्विटर जैसी सोशल साइट्स पर अब लोग राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर भी जमकर बहस करने लगे हैं जिससे आम जन के बीच जागरूकता आई है।

ब्लॉग व वेब पोर्टल तो अपना विचार निष्पक्ष रूप से रखने वालों के लिए वरदान साबित हुए हैं। न्यू मीडिया जगत में तो वेब पोर्टलों की बाढ़ सी आ गई है। ख्याति पाने के लिए अधिकतर लोग अपना निजी वेब पोर्टल बनाते हैं। पोर्टलों और ब्लॉग पर राष्ट्रीय मुद्दों पर परिचर्चा होने लगी है। इसका फायदा यह है कि इसमें सभी लोगों को अपने विचार व्यक्त करने का स्थान मिल जाता है जिसके परिणामस्वरूप वह उस मुद्दे में विशेष रूचि लेने लगते हैं।

यू-ट्यूब पर तो किसी भी मुद्दे से संबंधित वीडियो देखे जा सकते है जिसके कारण इसकी लोकप्रियता तीव्र गति से बढ़ी है। न्यू मीडिया से राजनीतिक हल्कों की नींद भी उड़ गई है। गूगल द्वारा जारी की गई ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार की ओर से गूगल को कई बार प्रधानमंत्री, कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों और अधिकारियों की आलोचना करने वाली रिपोर्ट्स, ब्लॉग और यू-ट्यूब वीडियो हटा देने को कहा गया।

जुलाई 2010 से लेकर दिसंबर 2010 के बीच गूगल के पास इस तरह के 67 आवेदन आए जिनमें से 6 अदालतों की ओर से, बाकी सरकार की ओर से आए। यह आवेदन 282 रिपोर्ट्स को हटाने के थे जिनमें से 199 यू-ट्यूब के वीडियो, 50 सर्च के परिणामों, 30 ब्लॉगर्स की सामग्री हटाने के थे। हालांकि गूगल ने इन्हें नहीं हटाया और केवल 22 प्रतिशत में बदलाव किया।

न्यू मीडिया ने समाज में अलग पहचान बनाई है और इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इससे युवा पीढ़ी ज्यादा जुड़ रही है। भविष्य में मीडिया के इस नए माध्यम की संभावनाएं और अधिक बढे़गी।

दाम मजदूर से कम, काम मालिक की निगरानी



पत्रकारिता के प्रारम्भिक दौर में इसे अभिव्यक्ति के साथ-साथ जनजागरण का माध्यम माना जाता था। किन्तु वर्तमान परिवेश में बदल रही पत्रकारिता की दिशा और दशा दोनों ही चिन्ता का विषय बनते जा रहें हैं। पत्रकारिता जगत में हो रहे इस परिवर्तन में कौन सी प्रक्रिया उचित है? इसके बारे में हम यहां राष्ट्रदेवपत्रिका के संपादक श्री अजय मित्तल जी से उनके विचार जानने का प्रयास कर रहें हैं-

प्रश्न 1. आपका पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का क्या उद्देश्य रहा?

उत्तर- पत्रकारिता चुनौतिपूर्ण व्यवसाय है। जो सत्ता सारी व्यवस्थाओं की निगरानी करती है, उसकी भी निगरानी करने का दायित्व पत्रकार का है। इसीलिए समाज को कुछ वैचारिक बदल की ओर अग्रसर करने के लिए मैंने पत्रकारिता को चुना जिससे आम लोग समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए अपना योगदान दे सकें।

प्रश्न 2. वर्तमान समय में आप पत्रकारिता के क्षेत्र में क्या बदलाव देखते हैं?

उत्तर- आज पत्रकारिता अपने मार्ग से भटक रही है। पत्रकारिता के आधार पर प्राप्त शक्तियों का पत्रकार दुरूपयोग कर रहे हैं। पहले पत्रकार देश में हो रहे घपलों, घोटालों व भ्रष्टाचार को उजागर करते थे लेकिन अब वह इसका हिस्सा बन रहे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह शीर्ष पत्रकारों का नाम आया उससे पत्रकार की गरिमा पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सभी स्तरों के पत्रकार प्रेस को प्राप्त अधिकारों को अपने विशेषाधिकार समझने लगे हैं और इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। स्वयं की सहूलियत के लिए पत्रकार ऐसा करते हैं। उनमें अब समाज के दिशा निर्देशक के बजाए राजनेता के गुण आ रहे हैं।

प्रश्न 3. राष्ट्रीय महत्व के मुददों पर मीडिया की भूमिका और प्रभाव को आप किस प्रकार से देखते हैं?

उत्तर- सामान्य आदमी के पास न तो तथ्यों की जानकारी होती है और न ही विश्लेषण क्षमता। तथ्य और उनका विश्लेषण वह मीडिया से ही प्राप्त करता है। मीडिया ने आम आदमी की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर अपनी इच्छानुसार तथ्यों और विश्लेषणों को प्रस्तुत करना और उसके अनुसार समाज को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। मीडिया को अगर भ्रष्टाचार से कुछ प्राप्त होने की उम्मीद होती है तो वह तथ्यों में बदलाव कर देती है या उसे खत्म ही कर देती है। वहीं मीडिया को यदि कुछ निजी लाभ नहीं मिलता तो वह उन्हीं तथ्यों को खोजी पत्रकारिता का नाम दे देती है। ऐसे पत्रकार अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर समाज को अधूरे तथ्य, अर्द्ध-सत्य, असत्य बताकर पत्रकारिता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

प्रश्न 4. आपकी पत्रिका राष्ट्रदेव ग्रामीण क्षेत्रों में जाती है। ग्रामीण पाठकों के बारे में आपका क्या अनुभव रहा है?

उत्तर- ग्रामीण पाठक देश की समस्याओं के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। वह अपने स्थानीय परिवेश से बाहर जाकर राष्ट्र स्तर पर विचार करना चाहते हैं, देश के इतिहास, महापुरूषों को जानना चाहते हैं। वह पत्रिका के राष्ट्रीय विचारों का बड़ी संख्या में स्वागत करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के पाठकों के बीच किए गए सर्वे के दौरान पता चला कि वह देश के बारे में सोचने की ललक रखते हैं और इसीलिए वह राष्ट्रीय विचारों को पढ़ना भी पसंद करते हैं।

प्रश्न 5. आप अपनी पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास करते रहे हैं। क्या आज का मीडिया राष्ट्रवाद के प्रश्न पर अपनी भूमिका का निर्वाह सही ढंग से कर रहा है?

उत्तर- राष्ट्रीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले पत्रों का स्वर राष्ट्रहित के अनुकूल है। अंग्रेजी मीडिया भारतीय परिवेश व संस्कृति को नहीं समझती। वह देश की समस्याओं और यहां के परिवेश को पश्चिमी चश्मे से निहारती है और विश्लेषण प्रस्तुत करती है। अक्सर यह देखा गया है कि जो अखबार राष्ट्रवाद के समर्थक थे उनकी प्रसार संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है और जिन्होंने पंथ-निरपेक्षता के नाम पर राष्ट्रवाद को गिराने का कार्य किया वह ज्यादा नहीं चल पाए।

प्रश्न 6. वर्तमान समय में व्यवस्था परिवर्तन को लेकर चल रहे आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में जनजागरण के विषय पर मीडिया की भूमिका कितनी उपयोगी साबित हुई है?

उत्तर- चाहे अन्ना का आंदोलन हो या बाबा रामदेव का, सौभाग्य से मीडिया ने अच्छा प्रदर्शन किया। मीडिया ने अच्छे पक्षों को लगभग ठीक प्रकार से प्रस्तुत किया। इसीलिए राजनेताओं ने इन आंदोलनों को बदनाम करने के लिए कार्रवाई की। मीडिया इस समय व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दे पर लगभग समान और अनुकूल विचार रख रहा है।

प्रश्न 7. आप उत्तर प्रदेश पत्रकार एसोसिएशन मेरठ के अध्यक्ष हैं। पत्रकारों की कौन सी प्रमुख समस्याएं हैं, जिनको लेकर पत्रकार को लड़ाई लड़ने की आवश्यकता पड़ती है?

उत्तर- पत्रकारों, विशेषकर जो छोटे और मंझले पत्रों में काम कर रहे हैं, के सामने सबसे बड़ी समस्या वेतन की है। छोटे अखबारों में तो वेतन सरकार द्वारा अकुशल कर्मियों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम है। छोटे अखबारों में पत्रकारों को मिट्टी ढोनेवाले मजदूरों को मिलने वाले वेतन से भी आधा वेतन मिलता है। जबकि पत्रकारों की बड़ी संख्या इन्हीं छोटे एवं मझले समाचार पत्रों व चैनलों में कार्यरत हैं। वहीं पत्रकारों के लिए काम के घंटे भी बहुत अधिक है जिसके कारण वह न तो अपना श्रेष्ठतम योगदान दे सकते हैं और न ही उन्हें अध्ययन के लिए समय मिल पाता है। यह स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। इसके अलावा पत्रकारों के बेहतर भविष्य के लिए बीमा जैसी योजनाएं भी होनी चाहिए। आज यह आवश्यक है कि पत्रकार आर्थिक रूप से इस लायक तो हो कि वह वर्तमान और भविष्य की चिंता से मुक्त रह सकें।

प्रश्न 8. जेडे हत्याकांड से एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा का मुददा सामने आया है। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए आपके अनुसार क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

उत्तर- पत्रकारों के लिए सुरक्षा नीति बनाए जाने की आवश्यकता है। यह संभव नहीं है कि हरेक पत्रकार के साथ एक अंगरक्षक चल सके लेकिन इसके लिए बेहतर कानून होना चाहिए। राज्य स्तर पर कर्मचारियों के काम में बाधा डालने वाले पर कार्रवाई का कानून बना हुआ है, लेकिन पत्रकार को उसके काम के लिए धमकी अथवा रूकावट को इस कानून के दायरे में नहीं लिया जाता। पत्रकारों के विरूद्ध आपराधिक मामले की जांच भी जिले के एसपी स्तर के अधिकारी की देखरेख में होनी चाहिए क्योंकि छोटे स्तर के पुलिस अधिकारियों तक अपराधियों की पहुंच होती है। यह जिला स्तर का पुलिस अधिकारी पत्रकार-संबंधी किसी भी मामले की जांच की जानकारी राज्य शासन को भी नियमित भेजे।

प्रश्न 9. वर्तमान समय में किस पत्रकार की पत्रकारिता आपको आदर्श पत्रकारिता के सबसे निकट दिखाई देती है?

उत्तर- पत्रकारिता क्षेत्र सेवा क्षेत्र है। पांचजन्यसमाचार पत्र आज कम वेतन में भी समाज को सर्वोत्कृष्ट दे रहा है। आजादी से पहले बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे पत्रकारों की पत्रकारिता बड़ी आदर्श थी। उन्होंने अपने समाचार पत्र आजऔर रणभेरीमें अंग्रजों के खिलाफ जमकर लिखा और किसी भी प्रकार के प्रलोभन में नहीं आए। मेरे विचार में वर्तमान समय में ऐसी ही पत्रकारिता की आवश्यकता है जैसी पराड़कर जी के द्वारा की गई थी। वैसे तो हिन्दी पत्रकारिता की नींव ही त्याग, बलिदान और संघर्ष पर रखी गई थी। आदि संपादक जुगल किशोर शुक्ल ने अपने उदंत मार्तण्डनामक हिंदी के प्रथम पत्र को सरकारी प्रलोभनों से दूर रखकर आर्थिक कठिनाइयों से ही चलाया। आज के पत्रकार को इन उदाहरणों को भूलना नहीं चाहिए।

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Thursday, July 28, 2011

अंकों के दबाव में मौत से लगाव


भारत की मौजूदा शिक्षा नीति और सामाजिक परिवेश के चलते युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जिनमें आत्मविश्वास की कमी सामने आ रही है। हाल ही में 10वीं एवं 12वीं के छात्रों द्वारा आत्महत्या के कई मामले सामने आए हैं जिनमें ऐसे छात्र-छात्राएं भी शामिल हैं जो अच्छे प्रतिशत से उत्तीर्ण हुए हैं लेकिन आत्महत्या करने वाले यह सभी छात्र अवसादग्रस्त रहे होंगे। किसी ने अभिभावकों की उम्मीदों पर खरा न उतरने के कारण तो किसी ने पसंदीदा कॉलेज में प्रवेश न मिलने के कारण आत्महत्या का कदम उठाया। आज के प्रतिस्पर्धा भरे युग में अपनी जगह बनाने का डर युवाओं को सता रहा है जिसमें हमारी शिक्षा नीति भी जिम्मेदार है।
बेंगलुरू में रहने वाली एक छात्रा ने 85 प्रतिशत अंक आने के बावजूद आत्महत्या की जिसके पीछे कारण था कि वह 90 प्रतिशत अंक चाहती थी और कम अंक आने के कारण उसे अपने पसंदीदा कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला था। वहीं राजकोट के एक छात्र ने 10वीं परीक्षा के नतीजे आने से पहले मौत को गले लगा लिया। वह शहर के टॉपर में से एक था लेकिन उसे इस बात का डर सता रहा था कि इस बार उसके अच्छे अंक नहीं आएंगे। जबकि रिजल्ट आया तो पता चला कि 90 प्रतिशत अंकों के साथ वह टॉपर है। इसी प्रकार अन्य छात्रों ने भी परीक्षा में असफल होने या कम अंक आने की वजह से मौत को गले लगा लिया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा वर्ष 2009 में जारी आंकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन औसतन 6 छात्र परीक्षाओं में असफल होने के कारण आत्महत्या करते हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2007 में 1976, वर्ष 2008 में 2189 छात्रों ने परीक्षाओं में असफल होने के कारण आत्महत्या की वहीं वर्ष 2009 में कुल 2010 छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें से 15-29 वर्ष की आयु वाले छात्रों का आंकड़ा सबसे ज्यादा 1591 है। इससे स्पष्ट होता है कि युवाओं में परीक्षाओं को लेकर ज्यादा तनाव है जिनमें से कुछ इस तनाव के समाधान के रूप में आत्महत्या का विकल्प चुनते हैं। अपने भविष्य को लेकर भी युवा तनावग्रस्त रहते हैं। वर्ष 2007 में अपना कैरियर बनाने में नाकाम 1273 व्यक्तियों ने आत्महत्या की। वहीं वर्ष 2009 में इसका आंकड़ा बढ़कर 1354 हो गया।
आखिर क्यों छात्रों के आत्महत्या करने का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है? इसके पीछे शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक परिवेश ही जिम्मेदार नजर आते हैं। देश में विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्रों की अपेक्षा होती है कि वह कॉलेज में स्नातक की शिक्षा प्राप्त करें लेकिन सीटें कम होने के कारण और आवेदन ज्यादा होने के कारण इन कॉलेजों की कट-ऑफ भी ज्यादा होती है। इसके कारण अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद भी छात्रों को प्रवेश नहीं मिल पाता है और उन्हें निराशा हाथ लगती है। पिछले कुछ वर्षों में निस्संदेह विद्यालयों की संख्या बढ़ी है और शिक्षा के प्रति जागरूकता भी आई है, लेकिन विद्यालयों की अपेक्षा विश्वविद्यालयों की संख्या में अभी भी कमी है। राज्य स्तर पर विश्वविद्यालयों की कमी के कारण छात्र उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। इन विश्वविद्यालयों में सीटें सीमित होने और आवेदन सीटों की अपेक्षा कहीं अधिक होने के कारण कई छात्रों को प्रवेश नहीं मिल पाता है। परिणामस्वरूप वह तनाव का शिकार हो जाते हैं। विश्वविद्यालयों में सीटें कम होने के कारण 10वीं और 12वीं कक्षा में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है।
दूसरी ओर प्रतिस्पर्धा के माहौल में अभिभावकों का भी अच्छे नंबर लाने के लिए दबाव बना रहता है। परीक्षा में अच्छे नंबर न आने के कारण अभिभावक तुलना शुरू कर देते है जिसके कारण छात्र हीन-भावना का शिकार हो जाते हैं। इन्हीं सब कारणों के चलते छात्र आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। देश के भविष्य का निर्माण करने वाली शिक्षा नीति में व्यापक स्तर पर सुधार की जरूरत है। आज सीबीएसई बोर्ड को देशभर में मान्यता दी हुई है जिसके कारण अन्य बोर्ड पिछड़ रहे हैं। आज राज्य स्तर पर शिक्षा बोर्डों में सुधार की ओर कदम बढ़ाए जाने की आवश्यकता है जिससे वह भी सीबीएसई के समकक्ष शिक्षा व्यवस्था स्थापित कर सकें और पाठ्यक्रम में सुधार कर सकें। दूसरी ओर व्यापक स्तर पर विश्वविद्यालय भी खोले जाने चाहिए जिससे छात्रों को अपने ही राज्यों में उच्च शिक्षा प्राप्त हो सके। वहीं अभिभावकों को भी छात्रों पर अधिक दबाव नहीं डालना चाहिए।
एक ओर तो सरकार सर्व शिक्षा अभियान के कारण अपना सीना गर्व से ऊंचा करके खड़ी है वहीं दूसरी ओर छात्र इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। इसके लिए अवश्य ही कुछ सुधार किए जाने चाहिए अपितु तनावग्रस्त युवाओं के साथ देश के भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है।