Thursday, March 17, 2011

रागों में छुपा है स्वास्थ्य का राज



भारतीय संस्कृति को अपनी परम्पराओं, विशालता, जीवन्तता के कारण सर्वत्र सराहा गया है व विश्वभर में विद्यमान संस्कृतियों में श्रेष्ठतम माना गया है । भारतीय संस्कृति ने प्राचीन काल से ही विदेशियों को प्रभावित किया है । भारतीय चिन्तन के अनुसार भारतीय सभ्यता व संस्कृति की संवाहक हैं कलाएं । जीवन में सकारात्मक प्रवृत्ति, उल्लास व उत्साह भरने के लिए कलाएं मनुष्य को सदैव प्रेरित करती आई हैं जिनमें से सबसे उत्कृष्ट ललित कलाओं को माना गया है । इन ललित कलाओं में संगीत का स्थान सर्वोपरि है । संगीत एक ऐसी विधा है जो मानव चित्त पर विशेष व अमिट छाप छोड़ती है । भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व के अन्य देशों के संगीतों से श्रेष्ठ माना गया है । भारतीय शास्त्रीय संगीत का जन्म वैदिक युग में हुआ । उस समय संगीत ईश्वर प्राप्ति का सोपान था । देश के प्रमुख ग्रंथ गीता को श्रीकृष्ण ने बोलकर नहीं गाकर सुनाया, इसीलिए उसका नाम गीता पड़ा । ऋग्वेद में भी कहा गया है कि ‘‘तुम यदि संगीत के साथ ईश्वर को पुकारोगे तो वह तुम्हारी हृदय गुहा में प्रकट होकर अपना प्यार प्रदान करेगा ।’’ संगीत में ईश्वर बसा हुआ है ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की विशेषता राग पद्धति है जो किसी कलाकार की व्यक्तिगत प्रतिभा को सामने लाती है । स्वर तथा ताल किसी न किसी रूप में विश्व के सभी संगीतों में विद्यमान हैं लेकिन राग पद्धति केवल भारतीय शास्त्रीय संगीत की विशेषता है । राग का मूल अर्थ रंगनाहै, अर्थात रंग देने की प्रक्रिया । राग मानव चित्त को अपने रंग में रंग देता है,जिससे मानव चित्त प्रसन्न हो उठता है ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल जन मनोरंजन का ही साधन नहीं है, इसका सम्बन्ध प्रकृति व मानव शरीर से भी रहा है । भारत के प्राचीन वेदों में भारतीय संस्कृति व जीवन के तौर-तरीकों का वर्णन किया गया है । उसी में संगीत को सबसे बेहतर माना गया है । भारतीय शास्त्रीय संगीत का मानव स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है संगीत के सात सुर ‘‘सा,रे,गा,मा,पा,धा,नि’’ का शरीर पर विशेष प्रभाव पड़ता है । वेदों में शरीर के सात चक्रों का वर्णन किया गया है जो मानव शरीर के विभिन्न भागों का संचालन करते हैं । संगीत के सात सुरों का इन सात चक्रों पर विभिन्न प्रभाव पड़ता है । सा’ ‘मूलाधार’, ‘रे’ ‘स्वाधिष्ठान’, ‘गा’ ‘मणिपुर, ‘मा’ ‘अनाहत’, ‘पा’ ‘विशुद्ध’, ‘धाआज्ञाऔर नि’ ‘सहस्रचक्र को सुचारू रखने में मदद करते हैं । वेदों में संगीत को योग माना गया है जिससे मानव शरीर स्वस्थ रहता है । शरीर रचना विज्ञान के अनुसार सभी बीमारियां वात, पित्त व कफ दोषों के कारण होती है । इन दोषों के निवारण में राग विशेष भूमिका निभाते हैं ।

रागों से आत्मिक सुख की अनुभूति होती है जिसके कारण इसे रोग निवारण में उपयुक्त माना गया है । रागों से चिकित्सा को लेकर कुछ प्रयोग भी हुए हैं 20वीं सदी में पं. ओंकारनाथ ठाकुर ने राग पूरियाके चमत्कारिक गायन से इटली के शासक मुसोलिनी को अनिद्रा रोग से मुक्ति दिलाई थी । राग को अल्जाइमर के इलाज में भी लाभकारी माना गया है । अल्जाइमर रोग भूलने की बीमारी से सम्बन्धित है जो गंभीर अवस्था में रोगी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है । प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डां. आलिवर स्मिथ के अनुसार राग शिवरंजनीसुनने से स्मरण शक्ति बढ़ाई जा सकती है । वर्तमान में वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने प्रमाणित किया है कि 80 फीसदी बीमारियां मानसिक कारणों जैसे तनाव, चिंता, अवसाद आदि से होती है और संगीत एक ऐसी विधा है जिससे मानसिक संतुलन बना रहता है । रागों द्वारा चिकित्सा संगीत चिकित्साकहलाती है । आज संगीत चिकित्सा पर शोध हो रहे हैं और इसके सकारात्मक परिणाम निकलकर सामने आए हैं । रागों को सुनने के लिए विशेष समय निर्धारित किए गए हैं । यूं तो संगीत किसी भी समय सुना जा सकता हैं लेकिन स्वस्थ रहने के लिए इसको समयानुसार सुनना चाहिए । आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त और कफ दोष दिन के 24 घंटों के दौरान चक्रीय क्रम में कार्य करते है । सभी राग अलग-अलग मनोवृत्ति से जुड़े हुए है जिसके कारण रागों का स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है । समयानुसार रागों को सुनकर रोगों पर नियंत्रण करके विशेष लाभ उठाया जा सकता है। यहां कुछ रागों के नाम, उनसे ठीक होने वाले रोग व समय सारणी दी जा रही है ।

राग

लाभ

समय

विशेषता

हिंडोला

उच्च रक्तचाप व गठियां रोग में लाभ

वसंत ऋतु की सुबह

सकारात्मक मनोदशा

कल्याणी

तनाव व डर को खत्म कर आत्मविश्वास जगाता है

रात्रि का पहला पहर

साहस और प्रेम

कांबोजी

तनाव व उदासी को खत्म करता है

सुबह व रात्रि का पहला पहर

आनंद, आशा और अभिलाषा को बढ़ाता है

दीपक

एसिडिटी, अपच व पेट संबंधी बीमारियों में कारगर

गर्मियों की संध्या

क्रोध और नकारात्मक भावनाओं को कम करता है

केदार

जुकाम, अस्थमा और सिर दर्द में लाभकारी

आदि रात्रि

सकारात्मक सोच

मोहनम

माइग्रेन व चिंता में आरामदायक

रात्रि का पहला पहर

साहस, चुनौती, दयालुता व प्रेम

काफी

अनिद्रा और नींद संबंधी विकारों में कारगर

निद्रावस्था से पूर्व

प्रेम अनुभूति व रचनात्मकता

भैरवी

गठियां एवं मासपेशियों से संबंधित रोगों में लाभ

पतझड़ में किसी भी समय

आनंद व शांति

चंद्रकौस

मधुमेह, उच्च रक्तचाप व ह्रदय संबंधी रोग

अर्धरात्रि (10 से 2 बजे)

शारीरिक एवं मानसिक शांति

शिवरंजनी

ऑटिज्म, मस्तिष्क विकार में लाभकारी व स्मृति वर्धक

अर्धरात्रि (10 से 2 बजे)

प्रोत्साहन

इसके अलावा रागमारवाऔर भोपालीसुनने से आंतें मजबूत होती है । वहीं मोबाइल, चलचित्र व खानपान प्रभावित होने के कारण विश्व में नपुंसकता के रोग बढ़ गए है । रागवसंतऔर रागसुरखनपुसंकता को दूर भगाते है । आसावारी’, ‘भैरवीसुहानीराग

सुनने से मस्तिष्क संबंधी रोगों व सिरदर्द से छुटकारा पाया जा सकता है ।

इन रागों को सुनकर रोगों का उपचार किया जा सकता है । रागों को यदि ईश्वर की स्तुति में मिला दिया जाए तो इसका विशेष लाभ होता है । इससे आत्मिक शांति तो मिलती ही है साथ ही ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है । संगीत के सात स्वरों द्वारा ईश्वर की अराधना होती है । साद्वारा ब्रह्मा’, ‘रेद्वारा अग्नि’, ‘गाद्वारा रूद्र’, ‘माद्वारा विष्णु’, ‘पाद्वारा नारद’, ‘धाद्वारा गणेशऔर निद्वारा सूर्यकी उपासना की जाती है ।

संगीत और प्रकृति के बीच संबंध

भगवान श्री कृष्ण जब बांसुरी बजाते थे तो गाय ज्यादा दूध देती थी । संगीत का प्रकृति के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है । संगीत के सात स्वरों की उत्पत्ति भी प्रकृति से हुई है । साकी उत्पत्ति मोरके स्वर से, ‘रेकी उत्पत्ति ऋषभजैसे बैल, गाय आदि । ‘‘की उत्पत्ति अज यानि भेड़, बकरी, ‘क्रौंच पक्षी का स्वर है । की उत्पत्ति कोयलसे हुई है । कहा भी जाता है कि पंचम स्वर में कोयल बोले । धैवत है यानि घोड़ा और निकी उत्पत्ति हाथीके स्वर से हुई है । उल्लेखनीय है कि पक्षी, जीव-जन्तु केवल एक ही स्वर में बोल सकते हैं जबकि मनुष्य सारे स्वरों में गा सकता है । भारतीय शास्त्रीय संगीत के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकबर के दरबार में नवरत्नों में शामिल तानसेन रागमल्हारगाकर वर्षा ला देते थे और रागदीपकगाकर दीप जला देते थे । रागों के स्वर का प्रकृति पर विशेष प्रभाव पड़ता है । हाल ही में मध्यप्रदेश के वन विभाग में एक शोध हुआ जिसमें वृक्ष प्रजातियों को मशहूर सितार वादक रविशंकर की रागभैरवीमें निबद्ध रचना सुनाई गई । राग से आंवला और सीताफल सरीखी फल प्रजातियों के बीजों में अंकुर फूटने की दर में 9 प्रतिशत का इजाफा हुआ । रागों से पशुओं के कठोर व्यवहार पर भी काबू पाया जा सकता है ।

Monday, February 7, 2011

अमेरिकी ईशारों पर अरब देशों की सत्ता

ट्यूनीसिया में जन विद्रोह के कारण हुआ सत्ता परिवर्तन अरब देशों के लिए आदर्श बन गया है और मिस्र, यमन, अल्जीरिया, सूडान, जॉर्डन, ओमान और यूएई के लोग सरकार के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं और लोकतंत्र के लिए आतुर हो उठे हैं । पश्चिमी देशों के इशारों पर चलने वाले इन देशों के तानाशाह देश की जनता का शोषण करते आए हैं और निजी लाभ कमाने के लिए देश की संपदा को लूटने से भी बाज नहीं आए ।

अफ्रीका के उत्तरी छोर पर बसे लगभग 1 करोड़ से अधिक की आबादी वाले ट्यूनीसिया में सत्ता परिवर्तन के पीछे केवल कुछ दिनों का जन-विद्रोह ही नहीं है । 23 साल से सत्ता पर काबिज तानाशाह जैनुल आबेदिन बेन अली ने देश को विकास के बजाए गरीबी, भ्रष्टाचार और भुखमरी की ओर झकझोंर कर रख दिया । ट्यूनीसिया को 1957 में फ्रांस से आजादी मिली तो हबीब बुर्गिबा सत्ता पर आसीन हुए । बुर्गिबा महात्मा गांधी के अनुयायी थे । फ्रांसीसी उपनिवेशवाद ने उन्हें कई सालों तक जेल में रखा । स्वतंत्रता के पश्चात जब ट्यूनीसिया का संविधान रचा जा रहा था तो वह भारतीय संविधान से बहुत प्रेरित थे । उन्होंने देश को सेक्युलर समाजवादी गणराज्य बनाया, लेकिन अमेरिका के दबाव में आकर निजी क्षेत्र को आर्थिक लक्ष्य बनाया । अरब मुसलमान होते हुए भी उन्होंने संविधान में फ्रांसीसी नागरिक संहिता को अपनाया और निजाम-ए-मुस्तफा को नकार दिया जिसके कारण सऊदी अरब से ट्यूनिसिया के संबंध अच्छे नहीं रहे । बुर्गिबा ने बहुपत्नी प्रथा को खत्म कर तलाक को गैर-कानूनी बना दिया, बुर्के पर पाबन्दी लगा दी, विवाह के लिए वधु की आयु 17 वर्ष कर दी और मदरसे की जगह आधुनिक शिक्षा व्यवस्था लागू कर दी । उन्होंने संसद में 25 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की और निचले सदन में श्रमिक यूनियनों, दानीरों और विशेषज्ञों के लिए उपयुक्त सीटें रखी लेकिन ट्यूनीसिया में विकास की प्रगति जारी नहीं रह सकी । पश्चिमी देशों के ईशारों पर 7 नवंबर 1987 को बुर्गिबा को डॉक्टरों द्वारा पागल साबित कराकर तत्कालीन प्रधानमंत्री बेन अली खुद राष्ट्रपति बन बैठे । सेना और पुलिस के बल पर उन्होंने शासन व्यवस्था को विकृत कर दिया और ट्यूनीसिया का राजकाज उनके परिवार के दायरे में सिमट गया । आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वह पश्चिमी देशों की कठपुतली बने रहे और जनता का शोषण करते रहे । अपना कार्यकाल बढ़ाने के लिए उन्होंने चुनावों की 2 वर्ष की अवधि को बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया और सेवानिवृत्ति की आयु भी 75 वर्ष कर दी । चुनावों में वह धांधली कराकर सत्ता पर काबिज रहे और जब उनका कार्यकाल 1 वर्ष रह गया तो उन्होंने अपने दामाद शाबेद अली मोटरी को उत्तराधिकार नामित किया । ट्यूनीसिया में जनविद्रोह की शुरूआत बेरोजगारी से क्षुब्ध स्नातक शिक्षित युवक द्वारा आत्महत्या करने से हुई । 17 दिसंबर 2010 को पुलिस ने एक युवक की फलों की गाड़ी जब्त कर ली और उसे दंडित भी किया । बेरोजगारी से क्षुब्ध इस युवक ने वहीं पर आत्मदाह कर लिया जिसकी खबर सुनते ही ट्यूनीसिया के युवकों का गुस्सा फूट पड़ा और वह सड़कों पर उतर आए । युवकों का गुस्सा देख बेन अली ने कुछ समझौतों की पेशकश की और 2014 में होने वाले संभावित चुनावों के बजाए कुछ माह में ही चुनाव करने की पेशकश की, लेकिन जनता की मांग सत्ता परिवर्तन की थी । जनविद्रोह को देख बेन अली परिवार सहित देश छोड़कर सऊदी अरब भाग गए । जनविद्रोह के सामने बेन अली सत्ता छोड़कर तो भाग गए लेकिन ट्यूनीसिया की यास्मीन क्रांति मात्र दिखावा लगती है क्योंकि सत्ता अभी भी पश्चिमी हुक्मरानों के हाथों में हैं । ट्यूनीसिया के प्रधानमंत्री अभी भी मोहम्मद गशूनी है जो वर्ष 1999 से इस पद पर आसीन है और कार्यकारी राष्ट्रपति के तौर पर फोआद मेबाज को नियुक्त किया गया है जो पिछली सरकार में संसद अध्यक्ष थे । यानि अफ्रीकी देश ट्यूनीसिया की सत्ता पर काबिज नेता अभी भी पश्चिम के ईशारों पर ही शासन करेंगे और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के जरिए अभी भी वैश्विक पूंजी के हितों का ख्याल रखेंगे । उल्लेखनीय है कि ट्यूनीसिया की रेतीली सतह के तले प्राकृतिक गैस, तेल और मूल्यवान वस्तुओं के भंडार है जिस पर अमेरिका व अन्य पश्चिम देश गिद्ध की तरह नजरें गढ़ाएं बैठे हैं । यहां अणु ऊर्जा के दो केन्द्र है । विश्व आर्थिक फोरम के आंकलन में यह छोटा सा गणराज्य दुनिया के प्रमुख अर्थ केन्द्रों में चालीसवें सोपान पर हैं ।

ट्यूनीसिया से प्रेरित होकर मिस्र के लोग भी 30 साल से सत्ता पर बैठे राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के खिलाफ सड़कों पर उतर आए । मुबारक अमेरिका के ईशारों पर देश की जनता पर शासन करते आए हैं । प्रदर्शनकारियों ने देश में 30 साल से जारी आपातकाल का अंत करने और राष्ट्रªपति को दो कार्यकाल से ज्यादा समय पर पद पर रहने से रोक लगाने की मांग की है । जनता ने मुबारक को देश छोड़ने के लिए भी कहा है । बताते चले कि मिस्र में जनविद्रोह की शुरूआत होने पर अमेरिकी ईशारों पर विपक्षी नेता मोहम्मद अलबरदेई मिस्र लौट आए हैं और जनता के साथ लोकतंत्र के प्रति आवाज बुलंद कर रहे हैं । अमेरिका ने मुबारक के स्थान पर उपराष्ट्रपति उमर सुलेमान को बिठाने का खुला समर्थन किया है । अरब देशों में उठी लोकतंत्र की लहर से लीबिया के राष्ट्रपति गद्दाफी से लेकर यमन के राष्ट्राध्यक्ष अब्दुलाह सालेह की सत्ता भी खतरे में है । वहीं अल्जीरिया, सूडान, जॉर्डन, ओमान जैसे अरब देश भी जनविद्रोह से अछूते नहीं है । इन देशों के लोग गरीबी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, महंगाई से क्षुब्ध होकर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं । जनविद्रोह को शांत करने के लिए मुबारक ने ऐलान किया है कि सितम्बर 2011 के बाद वह मिस्र के राष्ट्रपति पद से कुर्सी छोड़ देंगे और न तो वह खुद चुनाव लड़ेंगे और न ही अपने बेटे को लड़ने देंगे लेकिन मिस्र की जनता तुरंत बदलाव चाहती है । वहीं यमन के राष्ट्रपति ने ऐलान किया है कि 2013 में वह राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार नहीं होंगे और न ही वह अपने बेटे को उम्मीदवार बनाएंगे । अल्जीरिया में 19 सालों से चले आ रहे आपातकाल को खत्म कर दिया गया है । वहीं सूडान और जॉर्डन में भी बदलाव की मांग तेजी से उठ रही है ।

अरब देशों में बदलाव की मांग तेज हो चली है । यूं तो अरब दुनिया में पहले भी बदलाव देखा जा चुका है । इराक में सत्ता परिवर्तन हुआ, लेबनान में भी कोशिशें हुई और अल्जीरिया व तुर्की में भी कट्टरपंथियों ने जोर आजमाइश पहले भी की, लेकिन यह सभी परिवर्तन अमेरिका के ईशारों पर हुए और अब भी स्थिति ऐसी ही है । अमेरिका पूरी कोशिश कर रहा है कि बदलाव उसके ईशारों पर हो और सत्ता पर अपने गुर्गों को काबिज करने की तैयारी में है । अरब देशों में बदलाव के लिए लोकतंत्र का समर्थन करने वाला अमेरिका कई वर्षों से इसी तानाशाह का साथ देता आया है । अमेरिका चतुराई से अरब देशों की जनता के सामने अपनी छवि अच्छी बनाने के लिए प्रयासरत है जिससे अप्रत्यक्ष रूप से वह इन देशांे की सत्ता पर अपना अधिकार जमाता रहे ।

अरब देशों में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार मौजूद है जिस पर विश्व की अर्थव्यवस्था निर्भर है । इन्हीं जरूरतों को पूरा करने के लिए पश्चिम देश अरब देशों में अपने प्यादों को बिठाना चाहते है । भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा क्योंकि जनविद्रोह के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ गई है । इस समय अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 103 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर गई है । पिछली बार सबसे ज्यादा कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल थी । कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर सरकारी कंपनियों पर भी दबाव बढ़ेगा और उन्हें भी कीमत बढ़ाने पर मजबूर होना होगा जिससे देश में महंगाई और उफान पर पहुंचेगी ।

Friday, August 6, 2010

राष्ट्रमंडल बनाम भ्रष्टमंडल

राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार के आरोपों में लिप्त पाए गए अधिकारियों को आयोजन समिति ने उनके पद से हटा दिया और देश की जनता को यह बताते हुए गर्व महसूस किया । लेकिन क्या उनको पद से हटा देने मात्र से उनका दोष कम हो जायेगा? भारत देश में आयोजित किये जा रहे राष्ट्रमंडल खेलो के कारण वैसे ही महंगाई अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी है । गरीब लोग और अधिक गरीब होते जा रहे ह जबकि माध्यम वर्ग के लोग गरीबो की श्रेणी में आते जा रहे है। महंगाई से चारो ओर सब परेशान है । कई लोगो को तो भर पेट खाना नहीं मिलता है । वहीं देश का भविष्य माने जाने वाले बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे है। लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों के लिए देश का रूपया पानी की तरह बहाया जा रहा है । राष्ट्रमंडल खेलो के लिए विभिन्न कंपनियों के साथ मसौदे के लिए चार गुना रुपये दिए जा रहे है। राष्ट्रमंडल खेलो की आड़ में अधिकारी अपनी जेबें गरम करने में लगे हुए है। राष्ट्रमंडल खेल धीरे धीरे भ्रष्टमंडल बनता जा रहा है । ऊपर से लेकर सभी अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त है ।

लगातार मीडिया की ओर से बड़ते दबाव के कारण आयोजन समिति ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही । जिसके लिए उन्होंने अपने एक अधिकारी का इस्तीफा स्वीकार कर लिया और तीन अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया । लेकिन ये सब करने वालो से कोई पूछे की उनका ये फैसला क्या वास्तविक में प्रासंगिक है। क्या भ्रष्टाचार के आरोपियों के लिए इतनी सजा काफी है ? आम लोगों के रुपयों से अपनी जेबे भरने वालो कों क्या केवल बर्खास्त ही किया जाना चाहिए ? नहीं । उन्हें इससे भी कड़ी सजा दी जानी चाहिए । वो तो एक बार सारे पैसों से अपने बैंक अकाउंट भर चुके है । सरकार अगर वास्तव में उन्हें कड़ी सजा देना चाहती है तो आम लोगो के खून पसीनों की कमाई से बनी उनकी संपत्ति जब्त की जानी चाहिए । उनके बैंक अकाउंट सील कर दिए जाने चाहिए। तभी वह आम लोगों के दर्द कों समझ पायेंगे।

वहीं दूसरी ओर सरकार कों कलमाड़ी की भी गहन जांच करनी चाहिए क्योंकि वह भ्रष्टाचार के आरोपियों का साथ दे रहेहै और कई दलीले देकर उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे है । राष्ट्रमंडल खेलों कों भारत की शान बताकर केवल आम लोगों कों लूटा जा रहा है । राष्ट्रमंडल खेलों का खामियाजा आम लोगो कों भुगतना पढ़ रहा है वहीं इससे जुड़े अधिकारी इन खेलों की प्रशंसा केवल लोगों कों बेवकूफ बनाने के लिए कर रहे है । वास्तव में तो वह अपनी जेबें ही भरना चाहते है । खेलों ने देश के लोगों कों लूटने के अलावा कुछ नहीं किया है। निर्माण कार्य घटिया स्टार का हो रहा है। वहीं शिला दीक्षित भी इन सबके बीच अपना पल्ला झाड़ने में लगी हुई है। राष्ट्रमंडल खेल लोगों कों बेवकूफ बनाने के सिवा और कुछ नहीं है और खेल चाहे सफल हो या विफल हर तरफ से भारत कों ही खामियाजा भुगतना पड़ेगा। खेल यदि सफल होते है तो भारत पर अगले अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजित करने का दबाव बढेगा और विफल होते है तो करोडो रूपया गर्त में जायेगा ।

Friday, July 23, 2010

पाक के साथ वार्ता का कोई फायदा नहीं

केन्द्रीय सरकार ने लगता है पकिस्तान के सामने झुकने का मन बना लिया है क्योंकि हमारे आदरणीय विदेश मंत्री के सामने पकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने गृह मंत्री जी के पिल्लई का अपमान किया और वह सब कुछ चुपचाप सुनते रहे । इसके बाद उन्होंने सोने पर सुहागा वाली कहावत को सच करते हुए पिल्लई पर आरोपों की बरसात कर दी कि उन्हें ख़ुफ़िया एजेंसियों पर कोई टिपण्णी नहीं करनी चाहिए थी। आंखिरu पिल्लई ने टिपण्णी करके क्या गलत किया? वह तो मुंबई हमलो के आरोपी डेविड कोलमेन हेडली कि ओर से किये गए खुलासों के आधार पर बोल रहे थे लेकिन पाकिस्तान ने उनकी तुलना बिना तथ्यों के आधार पर भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले हाफिज सईद से कर दी । बचपन में मैंने एक कहावत सुनी थी कि चुप्पी का अर्थ हाँ ही होता है जिसे कृष्णा ने पिल्लई के पक्ष में कुछ ना बोलकर सच कर दिया। कुरैशी की ओर से लगातार भारत के अपमान के बाद जब विदेश मंत्री ने भारत आकर पिल्लई पर दोष मढ़ने शुरू असलियत तो उस पर कुरैशी ने भारत कि सराहना कि । आंखिर हमारे कूटनीतिज्ञ कब तक एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप करते रहेंगे ? कब वह समझेंगे कि एक हुए बिना कोई कार्य पूरा नहीं हो सकता । एक ओर पकिस्तान कि सरकार की तरफ देखा जाये तो वहां किसीने भी कुरैशी के खिलाफ ऊँगली नहीं उठाई लेकिन भारत में कृष्णा ने पिल्लई का साथ देने के बजाय उन्हें खरी खोटी सुना दी।



पकिस्तान कि ओर से भारत पर आरोपों कि बौछार और अपमान के बाद भी हमारी सरकार पाकिस्तान के साथ वार्ता जारी रखने कि इच्छुक है। पाकिस्तान तो हमेशा से ही भारत के खिलाफ रणनीति रचता आया है और अभी भी वह अपनी सरजमीं पर भारत के खिलाफ बड़ी साजिश रच रहा है । जैसा कि हेडली ने खुलासा किया है कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान की खुफियां एजेंसियां साजिश कर रही है। मुंबई हमलों के बाद भी उसका भारत विरोधी अभियान थमा नहीं है । कुछ ही दिन पहले पता चला कि पकिस्तान में भारत पकिस्तान संबंधों को बढावा देने वालो को खुफिया एजेंसियों द्वारा धमकाया जा रहा है, उनके साथ भद्दा सलूक किया जा रहा है । और तो और पाकिस्तान ने भारत विरोधी नारे लगाने वाले सईद के खिलाफ भी कार्रवाई ना करने कि कसम खा ली है। पाकिस्तान भारत के साथ केवल कश्मीर मुद्दा सुलझाने का ही इच्छुक है और उसमे भी वह कश्मीर को अपने पाले में लेना चाहता है। इसके आलावा उसकी भारत के मुद्दों में कोई रूचि नहीं है। लेकिन इन सब के बाद भी हमारी सरकारpk वार्ता करने के पक्ष में है ।

भारत पर पकिस्तान कि ओर से मंडराते खतरों के चलते अमेरिका ने भी भारत की ओर से हेडली का बयान सार्वजनिककरने पर आपत्ति जताई है जो बिलकुल बे बुनियाद है । अमेरिका को जब पकिस्तान की ओर से खतरे का अनुभव हुआ तो विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तान को चेतावनी तक दे डाली । और तो और पकिस्तान ने भी इस पर नरम रुख अपनाया । लेकिन भारत ने जब तथ्यों के आधार पर कुछ बोला तो वो पाक को नही पचा और उसने भारत के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया। अगर उस जानकारी को दुनिया के साथ साझा नहीं किया पर तो उसका कोई फायदा नहीं रह जायगा और वह कुछ दबी हुई फाईलों में बंद होकर रह जायगा । अमेरिका जब अपने ऊपर हुए हमलो की जांच दुनिया के सामने ला सकता है हम क्यों नहीं ? पकिस्तान के बारे में उपलब्ध सभी जानकारियों को सामने लाना होगा जिससे पाकिस्तान पर भारत विरोधी अभियानों को रोकने का दबाव बने ।